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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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(११६) सिंहासनबचीसी.

उस हलकारैको बुलाकर कहा कि तू, इस बातका ब्यौरा कुछ समझ गया है क्या ? तब उसने जबाब दिया कि महाराज कुछ मेरे जीमें आया है पर आपके आगे मुझे कहते शंका होती है. तब राजाने कहा कि तू जो समझा है सो निडर होकर बयान कर. वह बोला महाराज ! उसने जो शिर खोलकर छाती- पर हाथ रखखा शो उसने कहा कि जिस वक्त अँधेरी रात होगी तब मैं तुझसे मिलूंगा और उसनेभी छातीपर हाथ रख जबाब दिया कि, अच्छा दासकी समझमें यह कुछ आता है राजा कहा तू तो सब समझा है यही उनका मतलब है. मैंनेभी बडी देरतक घाटपर बैठे उनका मुद्धा मालूम कियाथा. पर तू अब मेरे तईं उसके घर लेचल. हलकारेने कहा अच्छा मैं हाजिर हूं महाराज ! चलिये. तब राजा हलकारेको ले उसके मकानके पास आया और उसको बिदा किया पिछवाडे चौबारेके एक खिडकी थी उसमेंसे चिरागकी ज्योति नजर आतीथी और कभी २ जो झाँकती थी तो उसकी झलकभी मालूम होतीथी जब जब दो प्रहर रात गुजरी और खूब अंधेरी होगया तब राजाने उधरसे एक कंकरी उस खिडकीमें मारी लगतेही वह झाँकि राजाको देख यह जाना कि वही पुरुष यहां आन पहुंचा. तब उसने तमाम घरका जवाहिर और सब गहना एक डब्बेमें भरा और साथ लेकर निकल राजा के पास आई कहा कि, यह ले और मुझे लेकर चल. राजाने कहा यों तो मैं तुझे न ले जाऊंगा क्योंकि तेरा खाविंद जाती