सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextहाथसे चितामे लगाई और सम्भल बैठी जब कपडे और बाल उसके जलकर बदनमे आंच लगी तब घबराकर उठी और सब लोग देखकर हँसे. वह चितामेसे कूद नदीमे जा पडी. तब राजासे चुप न रहा गया. और कहा कि अय सुन्दरी ! यह क्या है? वह बोली सुनो राजा ! इसका मर्म जाकर अपने घरमें पूछो और मै जो अपने कर्ममें लिखा लायीथी उसीका फल पाया. पर तूने अपने घरका भेद न पाया. हम सात सखियां इस नगरमें हैं उनमेकी एक मैं हूं और छः तेरे घरमे हैं ! यह कह वह तो पानी डूबगई. राजा अपने मनमे दुःख पा महलमें आया और छिप रहा. किसीको दिखाई न दिया. एक दिन और एक रात वहां लगा रहा. दूसरी रात जब हुई तब आधी रातके समय छहो रानियां हाथोंमें कंचनके थाल मिठाई पकवानसे भरभर लेकर महलके पिछवाडीकी वाडीमें गई. उसके आगे एक बन था. उस बनमे एक मठी थी. उसमें एक योगी ध्यान लगाये बैठा था. ये छहो रानिया दंडवते कर वहीं जा बैठीं. वहा राजाभी जो उसके पीछे पीछे आया था. यह अह- वाल देखने लगा. जब सिद्ध अपने ध्यानसे निश्चित हुआ, और उनसे हँस हँस बातें करने लगा. और जिसकदर ये मिठाई पकान लेगईथी सो सब आगे रख दिया. उसने भोजन किया और पान खाकर एक योगविद्याकी एक देहकी छे देह