सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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जाकर इंद्रकी सभामे पहुंचा दिया. राजाने जातेही वहां इंद्रको दंड- वत् की और हाथ जोड़ खड़ाहुआ. तब इंद्रने बैठनेको आज्ञा दी वह हुकुम पाकर बैठगया तब इंद्रने कहा तुम कहांसे आये हो । और तुम्हारा नाम क्या है ? देश तुम्हारा कौनसा है ! किस अर्थको यहां आये हो ! सो तुम कहो. तब राजा बोला कि-स्वामी ! अंबा- वती नगरीका मैं राजा हूं. मेरा नाम विक्रम है, और आपके पद पंकजके दर्शनके अर्थ आया हूं. तब प्रसन्न हो इंद्र बोला कि- हमनेभी तुम्हारा नाम सुनाथा. और मिलनेकी इच्छा थी सो तु- मने आके यहा उलटी रीत की अब जो कुछ तुम्हारा मनोरथ हो सो हमसे कहो और जो कुछ तुम्हें चाहिये सो मांगो हम तुम्हें देंगे. राजाने कहा-स्वामी ! आपकी कृपा और धर्मसे सब कुछ है और जो कुछ न हो तो मैं आपसे मागूं. आपका दिया हुआ सब कुछ तेरेपास है. राजाकी ये बातें सुनकर इंद्रने प्रसन्न हो अपना मुकुट और एक विमान दे यह आशीष दिया कि, जो तेरे सिंहासनको बुरी दृष्टिसे देखेगा वह तुर्त अंधा होगा. राजा वहांसे बिदा हो फिर अपने नगरमे आया और बधाई बजने लगी. इतनी बात पुतलीसे सुनकर राजा भोज सिंहासनपर हाथ धरकर एक अपने पावको ऊपर रख खडा होकर कहने लगा कि आसन मार गद्दीपर जा बैठूं. इतनेमें आँखोंसे अंधा होगया और दिवानी दिवानी बातें करने लगा. चाहता था कि हाथ उसपरसे उठावें पर जुदा न होता था. यह हालत देख