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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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आठईसवीं पुतली २८. ( १७३ ) स्थिर होजाय. प्रताप बढ़े, कीर्ति रहे वह दिनभी गुजर गया. राजा फिर अपने महलमें गया. रात ज्यों त्यों बीती. सुबह होतेही फिर उसी मकानपर आन खडा होगया तब मनमोहिनी नामक— अठाईसवीं पुतली— बोली—सुन राजा भोज ! बीरविक्रमादित्यके समान बली, साहसी और ज्ञानी कलिमें दूसरा कोई हुआ हो तो तू मुझे बतादे. औरजो मै कहती हूं सो सचकर जान. एक दिन- मैने राजा बीरविक्रमादित्यसे हँसकर कहा कि, स्वामी ! पातालमें राजा बालि बडा राजा है, जिसके दाससमानभी तू नहीं हो सकता है और जो अपना राजा तू स्थीर किया चाहे तो एकबार राजा बालिके पास तू जाकर आ. यह बात सुनतेही बैतालोंको बुला आज्ञा दी कि, पातालमें राजा बालिके पास मुझे ले चलो. यह सुनतेही बै- ताल तुर्त के उडे और दमभरमें पातालमें पहुँचा दिया. राजा वह नगर देख भौचक हुआ. और अपने मनमें कहने लगा कि, ऐसा नगर मैने आजतक कहीं नही देखा. आनंद कैलासके समान हो रहा है. धन्य राजा बालिको जो इस नगरका राज करता है. इस तरहसे नगर देखता हुआ राजाके सिंहपौरपर जा खडा हुआ और हाथ जोड बिनती कर द्वारपालोंसे कहा कि, अपने राजाको मेरे