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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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अठाईसवीं पुतली २८. ( १७५ )

जाताभी नहीं. जब इस जबाब सवाल कहनेका कुछ देर हुई तब फिर राजा बीरविक्रमादित्यने अपना शिर काट डाला. द्वारपालने राजासे कहा कि, महाराज फिर इस मनुष्यने जी दिया. राजाने फिर अमृत भेज दिया और कहा कि, उसे जिला समझाकर उसके नगरको पठा दो. एक दूतने आकर राजापर अमृत छिड़क जिलाया. और कहा कि तू अपने जीमे धीरज रख अब तुझे दर्शन होगा और जितनी राजाकी सभाके लोग थे उन्होंने एक मताकर राजासे कहा कि, महाराज ! विक्रमकी आशको निराश मत करो, क्योंकि उसने बड़ा साहस किया है. उनकी बातें सुन राजा बलि उठकर द्वारपर आगया और विक्र- मने दर्शन पाया. तब दंडवत् कर हाथ जोड कहा कि, महाराज धन्य है भाग्य मेरा जो मैंने आपका दर्शन पाया. और जन्म जन्मका दुःख गँवाया. फिर कहने लगा-महाराज ! क्या मेरा अपराध था जो आप मुझे दर्शन न देते थे ? क्या मैं साहसी नहीं हूं या मुझे लोकके लोग नहीं जानते ! वह कौनसा पाप था जो मैं आपके द्वारेपर आनेसे आपने बुरा माना ? सो मुझे कृपा- करके कहो. तब राजा बलि हंसकर बोला कि, सुन विक्रम कुलनायक ! तेरे समान और कोई राजा नहीं अब, कान देकर सुन कि, तेरे आगे इसका ब्यौरा कहता हूं. पहले राजा हरि- श्चंद्र बडा दानी, साहसी, यशी हो गया है और एक राजा जग- देव बडा प्रतापी और दानी हो गया है. उन दोनोंने भी बडा