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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( १२ ) सिंहासनबत्तीसी. सो सात द्वीप और नौ खंड पृथ्वीका अजीत होकर राज करे और बहुतसा जबाहिर उसमें जटा है. और उस सिंहासनमें बत्तीस पुतलियांभी बनी हैं. अमृत देकर उनको सांचेमें ढाला है. तुम रुखसत होते हुए वह सिंहासन राजाजी मांगो कि उसपर बैठकर आनंदसे राज करेंगे. यह रातको दीवाननें सलाह दी. और सुबहको राजाके दरबारमें दीवानने जाके खबर दी कि, महाराज ! विक्रम रुखसत होताहै और आपके पास आनेको बाहर खडा है. यह सुनकर राजा फिर फौरन दरवाजेपर आया ओर विक्रमने देखकर अपना माथा नवाया राजानें विक्रमसे कहा जो तुम्हारे जीमें आवे सो मांगो मैं खुश होकर तुमको वही दूंगा तब विक्रम बोला-महाराज ! जो आपने मुझपर दया की है, तो वह सिंहासन मुझे बकशो, जो इंद्रने आपको दिया है. यह बात सुनकर राजा बोला-अच्छा, सिंहासन तो हमने तुम्हें दिया, पर, यह काम मंत्रीका है, इसे तुम नहीं जानतेथे. यह कहकर सिंहासन मँगाया और पान तिलक देकर उस सिंहासनपर बिठाया और कहा कि-तुम अजीत हुए. अब किसी बातकी चिंता मनमे न करना, गंधर्वसेन मेरा बडा दोस्त था और तू उसके खान- दानमें बडा नामवर हुवा. इस तरहसे राजा विक्रमको आसीस देकर रुखसत किया. राजा वहांसे अपने घरमें आया.