सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in context( २४ ) सिंहासनबत्तीसी.
कुछ तुम्हें करना है सो कीजिये. दुश्मन तुम्हारा कोई नहीं राजाने यह सुनकर पंडितोंसे कहा कि—अब तुम बताओ कि, किस बुद्धीसे संवत् बांधू ? जो कुछ शास्त्रकी रीतिमे मुनासिब हो तिस तरहसे हमें कहो ? तब पंडितोंने कहा—पहले तो तुम अजीतमाल पहनो, फिर उसके बाद देश देशके ब्राह्मण और जमीनदार, राजा और अपने सब कुटुंबके लोग बुलावो. सवालाख कन्यादान सवालाख ब्राह्मणोंको करो. और जितने ब्राह्मण तुम्हारे मुल्कके हैं उनकी वृत्ति करदो. एक बरसका खजाना जमीदारोंको माफ करो और जो भूखा, कंगाल इस बरसमें आवे उसको वृत्तिका हुक्म करो. इसी तौरसे राजाने सब काम किया. और सिवा इसके जो जो दान पुण्य किया उनका बयान किससे हो ? एक बरसतक राजा अपने घरमें बैठे पुराण सुनता रहा और इस तरहसे संवत् बांधा, कि तमाम दुनियाके लोक धन्य धन्य करतेथे. यह सब अहवाल राजाको रत्नमंजरीने सुनाया और राजा विक्रमादि- त्यका यश गाया. और कहा—राजा भोज ! जो तुम इतने हो तो इस सिंहासनपर बैठो. सुनके राजाने कहा सच है जो कुछ तूने कहा यह बात मुझेभी पसंद आई. इतना कहकर राजा अपनी सभामें जाकर बैठा. और दीवान मुसदियोंको बुलाया कि, तुम सब तैयारी संवत् बांधनेकी करो. इस दिनकी वह