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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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[Header] पाँचवीं पुतली ५. ( ४५ )

न चली और कहने लगा कि, सेठजी ! अब पालें इसकी चढ़ावो, लोगोंने पालें चढ़ाई और उसने कूदकर लंगर काटदिया. पानी- की तेजीसे और हवाकी तुंदीसे जहाज चल निकला. और कोई रस्सा उसके हाथ न लगा उसी जगह रहगया. जो कुछ विधा- ताने कर्ममें लिखा है उसको कोई मिटा नहीं सकता. अलकिस- वह राजा वहांसे बहताहुआ चला. और जाते जाते उसे एक नगर नजर आया. वह वहां जानेलगा. उस नगरका जो दर- वाजा था उसपर ज्योंही निगाह की त्योंही देखा कि, चौखटपर लिखा हुआहै कि सिंहावतीकी राजा विक्रमादित्यसे शादी होगी. यह देख राजाको अचरज हुआ कि, यह किस पंडितने लिखा है ? जब उस दरवाजेके अंदर गया तो वहां जाकर एक महल देखा और वहां रांडियां हैं. मर्द कोई नहीं है. और एक अच्छे पलँगपर सिंहावती सोती है. और चौकीकी सहेलियां बैठी हैं यहभी जाकर पलँगपर बैठगया. और तुर्त उसको जगा दिया वह उठकर बैठगया तब राजाने हाथ पकड़लिया और दोनों सिंहा- सनपर जा बैठे. सब सखियां हाजिर हुईं और इस भेदसे वाकिफ थीं कि राजा विक्रमादित्य यहां आवेगा और इससे उसकी शादी होगी. राजाको जो देखा तो फूलोंकी माला ले आईं और गंधर्बब्याह किया. राजा जैसा दुःख पाकर पहुँचाथा वैसा हँसा. इसवख्त उसने सुखोपभोग किया. अलगरज वे दोनों आप-

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