सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextपांचवी पुतली ( ४७ ) इस घोडोंमेंसे किसी घोडेपर चढाकरो. भेद तो इसे वहांका मालूमही था. दूसरे दिन घोडा उसने वहांसे मँगवाया. और उसपर सवार हो बर्ता फेरने लगा. वह राजाका अहवाल देख रानीभी खुश होती थी. और राजाभी खुश होताथ.. इसी तरह कईएक दिन आर २ घोडोंपर सवार होतारहा. एक दिन उस घोडीको मँगाया और रानीके हुक्मसे उस घोडीपरभी सवार होगया. रानी तो गफलतमें रही, कि इसने कोडा किया. घोडी- मानिंद हवाके राजाको ले उडी और सखियाँ पछता रहगईं. इतनेमें राजा अवानती नगरीको आन पहुँचा. वहां नदीके किनारे एक सिद्ध बैठा देखा, तब राजा उतर दंडवत कर उसके पास जाकर बैठा. सिद्धका जब ध्यान खुला तब उसने इसे देखा, देखकर खुश हुआ और एक फूलकी माला इसे दी और कहा कि-राजा ! विजयमाला मैने तुझे दी है. इसका गुण यह है कि, जहां जायगा वहां फतह पावेगा. और यह माला पहिनेपर तू सबको देखेगा पर तुझे कोई न देखेगा. फिर एक छडी राजाको दी और उसका ब्यौराभी समझाकर कहा कि, इस लकडीका यह ख्याल है कि पहले पहर रातको इसके पास सोनेका जडाऊ गहना जो मांगोगे तो यह देगी, और दूसरे पहर रातको एक खूबसूरत नारी ऐसी देगी कि जिसे देख राजा तुम आशिक होजायगा और तीसरे पहर रातको जो इसे