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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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छठी पुतली ६. ( ५१ )

बहुतही खुश हुआ, रातभर वहीं रहा. जब सुबह हुई तब सूर्य निकला जो कुछ अहवाल ब्राह्मणने कहाथा वह सब वहा देखकर वीरोंसे कहा-एक बात मेरे जीमें आती है. कि मेरे तईं ले जाकर इस खंभपर बिठलादो. और भगवानका ध्यानकर अपने स्थानको जाओ. तब वीरोंने उसे खंभ पर ले जाकर बिठा दिया और वे अपने मकानको गये. ज्यों ज्यों वह बढ़ने लगा त्यों त्यों राजा अपने दिलमें खौप करने लगा जितना सूर्यके नजदीक पहुँचताथा उतनाही गर्मीसे जला जाताथा। निदान सूर्यके निकट पहुंच जलकर अंगार होगया. जब खंभ बराबर रथके पहुंचा और रथवान्ने एक मुर्दा जला हुवा देखा तब अपने रथके घोडोंकी बाग खेंची. सूर्यने बैंककर देखा कि, खंभपर जला हुआ एक आदमी लग रहा. है. सूर्य त्राहि त्राहि कर बोले कि-यह साहस आदमीका नहीं. यह कोई योगी है या देवता या कोई गंधर्व. इस मुर्देके होते मैं इस जगह किसतरह भोजन करूंगा ? यह कहकर सूर्यने अमृत ले, इसपर छिडकाया तब राजा राम रामकर पुकार उठा और देखकर सूर्यको दंड- वत् कर हाथ जोड़ कहने लगा कि, धन्य, है भाग्य मेरा और मेरे कुलका जो आपके दर्शन पाये और मैंने इस जन्ममें यज्ञ दान किये थे इसीके सबबने तुम्हारे चरण देखे जिन्दगीका जो फल था सो मुझे मिला. इच्छा संसारमें सबकी है, लेकिन जिस