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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ५४ ) सिंहासनबत्तीसी.

सिंहासनपर बैठे राजा बोला-विक्रममें वस्फ क्या थे ? तू वे मुझसे बयान कर. तब पुतली बोली-सुन राजा ! विक्रमका अहवाल. एक दिन राजा वीर विक्रमादित्य अपने घरमें दोपहर रातको सोता था और-तमाम शहर नींदमे यहांतरु गाफिल था कि, जो किसी आदमीकी आवाज न आतीथी. इतनेमे उत्तर दिशाकी तरफ नदीके पार एक स्त्री ढाढे मारके रो उठी. उसका आवाज राजाके कान पडगया. तब राजा अपने मनमें चिन्ता करने लगा कि, हमारे नगरमें कोई दुखी आया है कि, वह अपने दुःखमे कूक मार मार रो रहा है. यह बात दिलमें बिचार ढाल तलवार हाथमें ले उधरको चला. और नदीके किनारेपर पहुँचकर वस्त्र छोड लंगोट मार पैरकर पार हुआ और थोडा आगे बढ़कर देखा तो एक अति सुंदरी जवान नारी खड़ी कूकमार रो रही है. उसके पास जाकर राजाने पूंछा कि, पुरुषका तुझे वियोग है ? या पुत्रका शाक है ? सो कह ! या तुझे सौनका साल है ? इनने दुःखोंमें किस दुखरो तू रोतीहै ? जो कुछ तुझे व्यापा है सो मुझे कह ? तब वह कहने लगी-सुन राजा ! हमारा बालम चोरी करताथा इतनेमें शहरके कोतवालने उसे पकड़कर शूली दिया है. और मैं उसकी मुहब्बतसे कुछ खाना खिलानेको लाईहूं और चाहती हूं उसे भोजन करवाऊं. पर शूली ऊंची है और मेरा हाथ उसके मुंह तलक नहीं पहुंचता. इस दुःखसे रोतीहूं और बहुत यत्न करतीहूं पर पहुंचने नहीं पाती. अब नरपतिने कहा यह तो थो-