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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ६२ ) सिंहासनबत्तीसी. चाहता है कि, तुझे अपने घर ले जाऊ. तब वह बोली—महाराज ! यह बात तो मेरेभी दिलमें आती है. पर क्योंकर जाऊं ! तुम्हारा नगर समुद्रके पार है. तब राजाने बचन दिया कि, मै तुझे ले चलूंगा. समुद्र लांघनेकी फिक्र अपने मनमें मतकर. इस तरह ले जाऊंगा कि, तुझे मालूमभी न होगा. यों दोनोंने आपसमे बातें कर रैन आनंदसे निकाल और सुबह होतेही राजाने पानी दूसरे कुएसे निकाल उसपर छिडक दिया कि, फिर वह बंदरिया हो कर दरख्तपर जा चढी और राजाभी वहीं छुप रहा. उसी दम योगी आन पहुँचा. वही यत्न योगीने कर छिन एक वहां सुरता खुशी की. जब योगी चलने लगा तब वह सुंदरी बोली—महाराज ! मेरी एक विनती सुनिये. कुछ प्रसाद मैं आपके पास मांगती हूं सो तुम मुझे कृपा कर दीजिये. यह सुन योगीने हँसकर एक कमलका फूल उसे दिया और कहा कि, एक लाल हररोज इस कमलसे पैदा होगा और कभी न कुम्हलायगा. इसे तू अच्छी तरहसे रखना. यह सुनकर उसने अपनी चोलीमे रखलिया. और दिल उसका खुश हुआ. योगी फिर उसे बंदरी बनाने आप चला गया. राजाने आकर फेर कुएसे पानी निकालकर उसे नारी बनायी. और उसने यह कमलका फूल राजाको दिखाया और कहा कि-महाराज ! एक अद्भुत चरित्र है कि इसमेंसे एक लाल हररोज निकलेगा