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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ७६ ) सिंहासनबत्तीसी. बोली - सुन राजा भोज ! उस मोहनीसे राजा निक्रमादित्यने गांधवे विवाह किया. और जो कुछ आगे राजाके पराक्रम हैं सो मैं कहती हूं कान देकर सुन. वह रंडी दैत्यसे जो छुडायीथी उसे राजाने यों कहा-सुन सुंदरी ! मैं तुझे पूछताहूं कि, देवने तुझे कहां पाया था ? कौन द्वीप और कौन नगर तेरा ? और कौन बाप है तेरा ? नाम ले उसका, अपना सब ब्यौरा मुझसे कह और सब बातें तुर्त बताव ? अब देर मत कर सुनकर तेरी अवस्था जैसा तू कहेगी वैसाही मैं विचार करूंगा. वह नारी बोली-महाराज ! अब मेरी कथा सुनो, कि किस्मतका लिखा मिटता नहीं है और जो कुछ विधाताने कपालमें लिखा है वह इन्सानको भुगतना होता है. एक ब्रह्मपुरी है समुद्रके पास जिसे सिंहलद्वीप कहते हैं वहांके ब्राह्मणकी मैं बेटी हूं. एक दिन अपनी सखियोंके संग तालाबपर स्नान करनेको गई थी और वह तालाब ऐसा था कि, घने घने दरख्तोंसे सूर्य वहां नजर न आता था. वहां सखियोंके साथ मैं स्नान पूजा करके घरको आतीथी कि सामनेसे यह राक्षस नजर आया. और मुझे देखकर वहांही रति मांगने लगा ज्यों ज्यों मैं न मानती थी त्यों त्यों मुझे बहुत दुःख देता था. मैं अनब्याही अपना धर्म क्योंकर गँवाती ? कितनेक दिनोंसे मुझे सताताथा और नरकमें पडनेसे डरता न था. राजा ! अब तूने धर्म रखलिया, और