सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
Page 8 of 190
Read in context[Page Header] सिंहासनबत्तीसी. (७)
पकड़कर उठाया और बिठाया, गरूरका नशा गोंको बुलाया चढ़ाथा सो सब उतर गया. तब तोबा करके पांओमेयोंने बड़ी कहने लगा क्या मैंने ऐसी तकसीर की, जो मुझपर खेवारमें कुछ हुई ? इधर उधरकी राह बाट के लोग जो वहां इकट्ठे हुए थेकहा-२स कहा तूने ऐसी बात मुँहसे निकाली और राजा सुनेगा तो अँध्रों तुझे तोपके मुँहपर रखकर उडा देगा. यह सुनतेही वह गिड़ गिड़ाने लगा. रहे सहे उसके होश और हवास ओरभी जाते रहे. जानके डरसे थलग, दम उसका होठोंपर आरहा. मिन्नत और जारीसे बारे छूटगये. राजाके उस फिरवीने वहांसे घपकी राहली. पर वह जब उस मंचानपर चढ़ता तो ऐसा बकबाद किये बिना न उतरता. एक दिन चार हरकारे राजाने एक कामको किसी- तरफ भेजेथे, वे रातको उधरसे फिरते हुए चले आतेथे और वह मंचानपर चढ़ा हुआ बक रहाथा, कि बुलाओ हमारे दीवान और अहलकारोंको कि इस जगह खारो महल और एक गढ़ बनावें सब सरंजाम लड़ाईका उसमें जमा करें कि, मैं राजा भोजसे लडूं और मारूं. जो मेरी सात पुश्तिका राज यह राजा करता है. यह सुनतेही उन चारों हरकारोंको अचंभा हुआ, और एकको उनमेंसे गुस्सा आया. एकने गजबसे कहा-इसे तँगीह करके मश्कें बांध राजाजीके पास लेचलें. दूसरेने कहा-वे इसके हकमें जो चाहें सो करें. तीसरेने कहा-इसने शराब पी है, मतवाला है, जो