सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextदेशके मैं रहनेवाला हूं कुछ वैराग्य मेरे जीमें हुआ इससे मैं आपके दर्शनको आयाहूं, अब आपका दर्शन मैंने किया इससे सब मेरा सोच विचार गया. राजा बोला-तुझे हम क्या रोज करदें, और कितनेमें तुम्हारा निर्वाह होगा ? तब इसने कहा- चार हजार रुपयेमें मेरी गुजरान् होगी. यह सुनकर राजाने कहा-ऐसा क्या काम करते हो जो चार हजार रुपये रोजीना हम तुझे देवें ? फिर विक्रम बोला-जो काम हमसे कहोगे हम वह करेंगे. जिस राजाके पास मैं रहता हूं उसको गाढ़ी भीड़िमें काम आता हूं और इस तरहसे चार हजार रुपये लेकर राजा वहां रहने लगा. यह बात पुतलीने समझा राजा भोजसे कही. जब इसी तरहसे नौदस दिन गुजर गये तब राजा वीरविक्रमादित्यने अपने मनमें विचारा कि, जो लाख रुपये रोज दान करता है उसका नित्यनेम क्या है, इसे मालूम किया चाहिए. किस देवताका इसे बल है ? इसी सोचमें रहने लगा. एक दिन क्या देखना है कि, दोपहर रातके समय राजा अकेला बनको जाता है यह देखतेही उसके पीछे होलिया. आगे आगे राजा और पीछे पीछे विक्रमादित्य इस तरहसे शहरके बाहर निकल एक बनमें पहुँचे. वहां जाकर देखा तो एक देवीको मंदिर है. और उस मंदिरके बाहर कहाड चढ़ा है और उसमें ब्रह्मकी आगसे घी औटता है वह राजा तालाबमें,