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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ८२ ) सिंहासनबत्तीसी. कृपा कर दीजिये. यह सुनतेही उसने वह थैली दी वह खुश हो उसी राजाके स्थानपर गया और दूसरे दिन रातको फिर वह राजा बनमें गया और वहां उसने देखा कि न देवीका मंदिर है और न कड़ाह है. स्थान भंग पड़ा है. यह दशा वहांकी देख सोचमें डूब गया. फिर जो होश आया तो हाय मारके रोने लगा, आखिरको लाचार हो उलटा फिर अपने मंदिरको आया उदास होकर सोरहा भोर हुवा जो सभाके लोग आया और राजाको देखा कि, विह्वल पड़ा है. न हँसता है, न किसीसे बोलता है, बल्कि जो कोई राज्यकी बात करता है, यह सुन- कर मुँह फेर लेता है. यह हालत राजाकी देख दीवानने विनत किया कि-महाराज ! आपका मन मलीन होनेसे सारी सभा उदास होरही है. राजाने यह जवाब दिया कि- आज तुम बैठकर दरबारका काम करो; मेरा शरीर माँदा है. तब प्रधान बैठ राजकाजकी बातें करने लगा. और जो कोई आताथा सो अपने मनमें जो चाहताथा सोई विचारताथा. कोई कहता था कि, राजा बीमार हो गया है, कोई कहता कि, राजाको कोई मोह गया है. और कोई कहताथा कि, राजा है नहीं. पर जो इसकी अवस्था थी वो किसीको मालूम न थी, इतनेमें अपने समयपर राजा बीर विक्रमादित्यभी गया और पूंछा कि-तुम्हारे मनमें क्या दुःख है ? क्योंकि मैंने