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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ४६ ) सिंहासनबत्तीसी. राजानेभी एक बाज अपने हाथपर बिठा लिया. मीरशिकारोंके हुक्म पहुँचा कि, जिस जिसके पास जो जो शिकारी जानवर तैयार हैं सो लेकर रिकाबमें हाजिर होवें. इस तरह बन उसने एक बनकी राहली और वहां जाकर किसीने बाज और किसीने बहरी और किसीने कुही, किसीने शाईन उड़ाई और अपने अपने जानवरोंके पीछे घोड़े बढ़ाये. और उधर राजा- नेभी जितने मीर शिकार थे उन्हें हुक्म किया कि, इस जंगलमे सब शिकार करो, मैं तमाशा देखूंगा. जो शिकार कर लावेगा वह इनाम पावेगा. और जो शिकार न कर लावेगा सो नौक- रीसे दूर होवेगा. यह बात सुनतेही जितने मीरशिकार थे उन सबोंने उस बनमें चारों तरफ जानवर छोड़े और उधर हुकुम बहेलियोंको किया कि, तुमभी शिकार करो. इस तरह सब शिकार करते थे और लालाके राजाको गुजराते थे वह खडा तमाशा देख रहथा. फिर उसने एक मरिंदापर बाज उड़ाया और आप उसके पीछे लगा. जिधर जिधर वह बाज जाताथा राजाभी पीछा किये जाताथा. इसमें कोसों निकल गया. देखो तो शाम होगई तब याद आई और फिरकर पीछे देखा तो वहां कोई आदमी नज़र न आया. और वह तमाम फौज राजाकी शाम हुएपर राजाको ढूँढ़ शिकार लेले आनकर नगरमें दाखिल हुई और वहां सूने जंगलमें राजा भटकता फिरता था. कहीं रहा