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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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पंद्रहवीं पुतली १५. ( ९३ ) राजाके सम्मुख एक श्लोक पढा वह सुनकर राजा मनमें बहुत प्रसन्न हुवा, इस श्लोकका मुद्दा यह था कि, मित्रद्रोही और विश्वासघातकी जो हैं सो नरक भोग करेंगे, जबतलक चंद्र और सूर्य हैं. यह सुनकर लाख रुपये राजाने उस ब्राह्मणको दान दिये और कहा कि-इसका अर्थ मुझे समझाकर कहो कि, क्या वृत्तांत है इसका ? तब वह ब्राह्मण कहने लगा कि—एक राजा बड़ा अज्ञानी था-उसकी रानी जो प्राणकी आधार थी, पलपरभी राजा उसे आपसे जुदा न करता था. जब सभामें बैठता था तब साथही जांघपर ले बैठता था. और जब शिकारको जाता था तब दूसरे घोडेपर बिठा साथ ले लेता. गरज जागना, सोना, खाना, पीना,एकही साथ था. पर ऐसा मूर्ख था कि, किसीसे लजाता न था. रानीको दृष्टिमें रखता था. एक दिन उसके प्रधा- नने अवसर पाकर हाथ जोड़ और शिर नवा कहने लगा कि-स्वामी ! जो मुझे जीव दान दें तो मैं एक बात कहू तब राजा बोला-अच्छा. वह बोला कि-महाराज ! रानीके संग आप शोभा नहीं पाते. राजकुलकी आन और मर्याद रहती नहीं आपको देश देशके राजा हँसते हैं, और कहते हैं कि- ऐसी सुंदरी राजाके मनमें बसी है कि, पलक ओटभी नहीं करता. एक मेरी बात मानिये. जो आपको वह बहुत प्यारी है तो एक चित्रपट लिखवाइये और अपने पास रखिये. इसमें लोक निंदा न करेंगे. यह बात प्रधानकी राजाके मनमें भाई

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