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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ९६ ) सिंहासनबत्तीसी. कि-ऐ कुँवर ! तू अपने मनमें भय मत कर. मैं तुझे नहीं खाऊंगा; क्योंकि, तू मेरे शरण आया है और मैंने तुझे जीवदान दिया है. अब तू निःसंदेश होकर आनंदसे यहां बैठ. यह बात रींछसे सुन उसके जीमें जी आया. इसमें दिन बीतगया और रात होगई तब रींछ बोला—राजपुत्र ! अब तो रात होगई यह नाहर शत्रु हम दोनोंको बैठा है इस वक्त सोना जीका जियान है. बेहतर यह है कि, दो दो पहर रात हम आपसमें जागें. आधी २ रात जागना. आधीरात तू जाग और आधी रात मैं जागूं राजपुत्रने कहा-बहुत अच्छा. रींछने कहा-पहले दोपहर रातको तू सोरह. मैं अब जागताहूं और पिछले दो याम निशाको तू जागियो, मैं सो रहूंगा. आपसमें इस तरह दोनोंने करार किया. और राजपुत्र सोरहा वह रींछ बैठा और चौकी देने लगा. इतनेमे शेरने रींछसे कहा कि-तू मेरी बात सुन और अज्ञानी मत हो. यह मनुष्य तो अपना भक्ष्य है तू क्यों विषका बीज बोता है? इसे नीचे डालदे हम दोनों इसे खाजाँय. यह आदमी है और हम तुम दोनों बनबासी हैं. हाथका माणिक गिरके हाथ फिर नहीं आता. जब यह जाग उठेगा और तू सोवेगा तो वह तेरा शिर काटकर फेंक देवेगा. अब यही बेह- तर है कि, मेरा कहना कर. फिर यह अवसर न पावेगा और आखिरको तू पछतावेगा रींछने जवाब दिया कि-सुन अज्ञानी बाघ ? अपने ऊपर अपराध लेना उचित नहीं ? जितना होता है