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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

by श्रीमदादि शङ्कराचार्य

Source: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished415 pages

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

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इस चित्र में कोई लिखित पाठ (श्लोक, सूत्र, अन्वय अथवा हिन्दी टीका) उपलब्ध नहीं है।

यह चित्र श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी (श्री राजराजेश्वरी) का है, जिनके साथ भगवती लक्ष्मी (कमलधारिणी) तथा भगवती सरस्वती (वीणावादिनी) विराजमान हैं, एवं मध्य में श्रीचक्र (श्रीयन्त्र) प्रतिष्ठित है।

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श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री १००८ शंकरभगवत्पाद विरचिता

सौन्दर्य लहरी

हिन्दी अनुवाद और

श्री विद्यातत्त्व कुण्डलिनी रहस्य

सहित

लेखक:—
स्वामी विष्णुतीर्थ महाराज


शुल्क ] १९४९

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(इस पृष्ठ/चित्र में कोई लिखित पाठ (Text/श्लोक/सूत्र) उपलब्ध नहीं है। यह केवल श्रीयन्त्र का एक रेखाचित्र/प्रतिमा है।)

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श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री १००८ शंकरभगवत्पाद

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श्रीमच्छंकर भगवत्पादकी जीवन झांकी

और

सौन्दर्य लहरी ।

अद्वैत स्थापनाचार्यं शंकरं लोक सद्गुरुम्
प्रस्थान त्रय भाष्यादि ग्रंथकारं नमाम्यहम्

अहं ब्रह्मस्वरुपिणो, मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत् शून्यं चाशून्यच ।

श्रीमद्भगवत्पाद जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने सौन्दर्यलहरी स्तोत्र में श्री आदि शक्ति मूलमाया एवं शुद्ध विद्या का तात्विक, यौगिक, और प्राकृतिक सगुणरुप का, रसगर्भित, भक्तिपूर्ण, व मनोहर वर्णन किया है । भगवत्पाद ने जो अनेक ग्रंथ तात्विक और धार्मिक विषय के लिखे हैं, उनमें 'सौन्दर्यलहरी' एक संकीर्ण स्तोत्र है, जिस की रचना भगवत्पादने बाल्यावस्था में ही की थी, ऐसा श्लोक ७५ और १०० से प्रकट होता है । श्रीशंकराचार्य का जन्मकाल इतिहास संशोधन कर्ता डा. भाण्डारकर, जस्टिस तैलंग, लो. तिलक, हाईकोर्ट वकील नारायण शास्त्री (age of shankar के लेखक), लो. का. बा. पाठक व म. रा. बोडस M. A. L L B प्रभृति विद्वद्मण्डली ने ७८८ ई. में केरल देशके कालडी ग्राम में वैशाक शु. १० मी को निश्चित किया है। इन की माता का नाम आर्य्यअंबा, पिता का नाम शिवगुरु और आजा का नाम

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विद्याधिराज था। शिवगुरुजी को संतान न होने के कारण उन्होंने शिवजी की आराधना की, जिस के फल स्वरूप भगवत्पाद का जन्म हुआ। बाल शकर का उपनयन संस्कार ५ वें वर्ष में हुआ और असाधारण विशद बुद्धि होने से ८ वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने वेदाध्ययन एवं १२ वें वर्ष में सब शास्त्राभ्यास समाप्त कर लिया, और उसी समय उनके पिता के भौतिक देह का परित्याग करदेने पर तत्पश्चात् ही ब्रह्मचर्य अवस्था में ही तीव्र वैराग्य उदय होने पर श्री श्रीगोविन्द पादाचार्य से ॐ कारेश्वर क्षेत्र में नर्मदा तटपर संन्यास दीक्षा ली। और १६ वर्ष की अवस्था में काशी जाकर प्रस्थान त्रयी पर भाष्य लिखे। तदन्तर सनातन वैदिक धर्म के पुनर्संस्थापन का अलौकिक कार्य किया; और तत्कालीन प्रचलित अवैदिक धर्म संप्रदायों को निरस्त किया। अद्वैत वेदान्त के सिद्धांत की विश्व में सुदृढ नींव कायम करने का एकांत श्रेय श्रीमच्छंकर भगवत्पाद को ही है। इतना सब कुछ आलौकिक कार्य ३२ वर्ष के अल्प समय में संपादित करके सन ८२० ई. में अपना प्रातः स्मरणीय नाम सदा के लिये छोडगये।

भगवत्पाद के घराने में परंपरागत सांबशिव उपासना चली आती थी। उनके शृंगेरी आदि मठों में शिव व शारदादि की शक्ति उपासना अद्यापि प्रचलित है शिव से निर्गुण परमतत्व प्राप्ति का ज्ञान मार्ग और शक्ति से शुद्धविद्या की उपासना समझना चाहिये। कांची मठ में श्रीचक्र की तांत्रिक उपासना समयाचार पद्धति के अनुसार आज भी होती है, जहां भगवत्पाद का विद्यार्थी कालीन आचार्य कुल था। सौन्दर्यलहरी के ११ वें श्लोक में श्रीचक्र का

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वर्णन है। अद्वैत ज्ञान और शक्ति उपासना दोनों के पारस्परिक मेल की आवश्यकता और विधिक्रम शृंगेरी आदि मठों में देखा जा सकता है। मानव जाति के परम उच्च तम उन्नत्तावकास की समाप्ति अद्वैत ब्रह्मानुभूति में कही गई है, जिस के लिये अनेक ब्रह्मविद्यापर साधन हैं, उनमें श्रीचक्र की उपासना एक बडे महत्व का साधन है। श्रीचक्र रेखा गणित के प्रमाण से दैवी शक्तियों का एक प्रतीक स्वरूप यंत्र बनाया गया है। भौतिक यंत्रों के सदृश यह भी अध्यात्म विज्ञान के विद्वानों की आध्यात्मिक खोज का फल है, जिस के द्वारा मनुष्य जीवन को आध्यात्म शक्ति की उपलब्धि करके सार्थक किया जा सकता है। इस विषय का साहित्य भंडार अरण्यको उपनिषदों और तंत्रों में मिलता है।

श्री चक्र की उपास्य देवता श्री ललिता त्रिपुरा है। मंत्र के मनन द्वारा मन का तत्सम्बन्धी देवता से तादात्म्य किया जाता है। श्री ललिता त्रिपुरम्बा के मंत्र का निर्देश सौन्दर्य लहरी के श्लोक ३२ व ३३ में हैं, जिसका विशेष रहस्य श्री भास्कर राय के वरिवस्या नामक ग्रंथ से जाना जा सकता है। श्री ब्रह्म गायत्री का वैदिक मंत्र और श्री विद्या का कादि हादि तांत्रिक मंत्रों को एकार्थी ही समझना चाहिये, जैसे विभिन्न वर्णों की गायों का दूध एक जैसा मधुर होता है। देखें त्रिपुरातापिनी उपनिषद्।

श्री भगवती की उपासना जैसे मंत्र यंत्र द्वारा बाहर की जाती है वैसे ही शरीर के अभ्यन्तर षट् चक्र एवं नाडियों (ईडा, पिंगला सुषुम्ना) में देवता रूपी शक्तियों के केन्द्रों की सहायता से योग

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पद्धति का साधन रूप का विधान है, तब देह को ही श्री यंत्र माना जाता है और मंत्रों की सहायता से मूलाधार स्थित कुण्डलिनी शक्ति का उत्थान कर के उसका आरोहण अवरोहण सुषुम्ना मार्ग से ब्रह्म रंध्र (सहस्रार) पर्यन्त किया जाता है । जिसका वर्णन श्लोक ९, १० एवं ३५ से ४१ तक किया गया हैं। सब शक्तियां बीज रूप से अपने शरीर में ही है, उनका जागरण कर के शरीर में ही ईश्वर की प्राप्ति की जाती है, कहीं बाहिर जाने की आवश्यकता नहीं। पिण्ड और ब्रह्माण्ड दोनों की रचना तात्विक रूप से एक समान है। योग मार्गानुसार कुण्डलिनी, मन, प्राण, नाद और बिन्दु इन पांचों के ज्ञान से ब्रह्माण्ड के यावतीय सब तत्वों का ज्ञान होता है। मूलाधारस्थिता कुण्डलिनी शक्ति ही महामाया कहलाती है, उसी का संवित् स्वरूप शुद्ध विद्या कहलाता है वह ही परापश्यन्ती मध्यमा वैखरी के रूप में व्यक्त होकर समस्त मंत्रमय जगत् की सृष्टि करती है, जिसकी योग उपासना का स्थान मनुष्य देह ही है। कहा है:—

देहो देवालयः प्रोक्तः ।

परन्तु कोई भी विद्या क्यों न हो, उसकी प्राप्ति सद्गुरू की कृपा के बिना कठिन है।

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति तेज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ गीता ॥

इसलिये तत्वज्ञ महानुभावों की शरण ग्रहण करना ही राजमार्ग है।

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श्री १०८ स्वामीजी विष्णुतीर्थ महाराज ने श्री भगवत्पाद शंकराचार्य की रची हुई सौन्दर्य-लहरी का हिन्दी भाषा में विद्वत्ता-पूर्ण अनुवाद कर के यह पुस्तक प्रसिद्ध की है । यह उनका अनुग्रह है ।

श्री स्वामीजी कतिपय महान पुरुषों में से एक संत महात्मा हैं । आप की विद्वत्ता और योगिक तपोबल प्रासादिक है ।

सौन्दर्य लहरी में तत्वार्थ योगार्थ और मंत्रार्थ गूढ रीति से और काव्यालंकारों से छुपा हुवा है । पाठक महाशयों को उसका प्रतितार्थ यथायोग्य समझने में सहायता हो इस हेतु से श्री स्वामीजी ने अपने विवरण की पुष्टी में वेदोपनिषद् शास्त्र के आधार स्थान विशेष बार-बार उधृत किये हैं । वैसे ही नाडीयों एवं श्री चक्र के नकशे भी देने का प्रयत्न किया है । जिससे पुस्तक पढ़ने वाले व योग साधन व उपासना करने वाले भक्तजनों को विस्तृत माहिती द्वारा सन्देह कटकर उनके मन को आनन्द लहरीयों की प्राप्ती हो । यह पुस्तक आदरणीय और संग्रहणीय है । इति शिवम्

देवास जूनियर<br>मध्यभारत<br>ता. २५-३-४९<br>फा व. ११ संवत २००५विनायकराव बापूजी<br>वैशंपायन<br>रिटायर्ड स्टेट कौन्सिलर.
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ग्रन्थ परिचय

भारतीय तत्वज्ञानियों में जगद्गुरू स्वामी शंकराचार्य्य का नाम सर्वप्रथम है । संस्कृत साहित्य के पंडितों का आज भी अभाव नहीं है किन्तु आध्यात्मिक अनुभूति और उच्च स्तर पर पहुंचने वाले साधन-निष्ठ पुरुषों का अभाव सा ही है । पुस्तकों का साधारण अनुवाद कर देना सरल सी बात है किन्तु ग्रंथ के गर्भ भाग में प्रवेश कर उसका आध्यात्मिक तत्व निकालना और उसे साधन उपयुक्त बनाकर जनता के सामने रखना बडा कठिन है । हम पुरातन शास्त्रज्ञों से यदि आत्मा, मन, और प्राण की परिभाषा पूछे तो वे संतोष जनक उत्तर नहीं दे सकते । इसको कोई अध्यात्मिक पुरुष अस्वीकार नहीं कर सकता कि स्वामी शंकराचार्य्य ने सौंदर्य लहरी के १०३ श्लोकों में उपासना का कितना गूढ रहस्य और योग साधनों की कितनी उपयोगिता बतलायी है । भगवान शंकराचार्य के इस स्तोत्र मे जो भगवती की स्तुति की गई है उसमें उनके उद्गार कितने श्रेष्ठ, स्पष्ट, गंभीर, और उन्नत प्रदर्शित किये गये हैं । ऐसे बृहद्ग्रंथ का अनुवाद करना और उसे आध्यात्मिक साधना से उपयुक्त कर देना सरल बात नहीं है । उस पर तो वही महात्मा प्रकाश डाल सकते हैं जो आध्यात्मिक उच्च स्तर पर पहुंचे हुवे हैं और अधिकारी हैं ।

ब्रह्मनिष्ठ श्री स्वामी विष्णुतीर्थजी महाराज ने इस अनुपम ग्रंथ का अनुवाद करके हिन्दी जगत का बडा उपकार किया है । प्रस्तुत पुस्तक के कुछ पृष्ठों को पढने से ही स्वामीजी के गंभीर अध्ययन का परिचय मिलता है ।

वेद, वेदान्त, उपनिषद, शास्त्र, तंत्रशास्त्र, योग, मंत्रशास्त्र तथा भारतीय तथा पाश्चात्य तत्वज्ञानियों के वैज्ञानिक अनुसंधान के

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दृष्टिकोण को लेकर मंत्रोंका महत्व समझाया है । प्रत्येक श्लोक विशेष महत्व रखता है जिसमें स्वामीजी के अध्ययन की झलक स्पष्ट दिखाई देती है ।

मंत्रों के विषय में स्वामीजी ने जो व्याख्या सहित अपने विचार लिखे हैं वह मंत्रशास्त्र के साधकों के लिये गूढतत्व, एवं अतीव उपयोगी है । शिवजी के तांडव नृत्य के सम्बन्ध में जो भाव प्रकट किये हैं उसमें स्वामीजी की मौलिकता स्पष्ट हो रही है । आनन्द-लहरी को पढते पढते पाठक स्वयं आनन्द विभोर हो जाता है । सौन्दर्य लहरी को दो भागों में विभाजित किया गया है । प्रथम भाग में ४१ श्लोक आनन्द लहरी के नाम से प्रसिद्ध हैं, और उत्तरार्द्ध-खंड सौन्दर्य लहरी है । दूसरे खंड को पढ कर अनात्मवादी भी आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार कर लेगा । चितिशक्ति का वर्णन और अपरोक्षानुभूति के विषय को इतना स्पष्ट किया है कि पाठक के चेतना स्तर को हिला देता है ।

चक्रों और कुण्डलिनी का विषय बहुत सुन्दर ढंग से स्पष्ट किया गया है । उसका रहस्योद्घाटन बडे सरल शब्दों में किया गया है ।

प्रस्तुत ग्रंथ को साधनायुक्त बनाने में स्वामीजी ने स्तुत्य प्रयत्न किया है और इसका समीकरण भी बहुत स्पष्ट हुआ है ।

विचारी, विवेकी, और ज्ञानी इस ग्रंथका समुचित आदर करेंगे और इस ग्रंथ से लाभ उठावेंगे । आध्यात्मिक जिज्ञासु स्वामीजी के इस महान कार्य के लिये आभारी हैं ।

इस ग्रंथका अधिक से अधिक प्रचार हो यही मंगल कामना है ।

कल्पवृक्ष कार्यालय उज्जैन ।
दिनांक ३ मार्च सन १९४९
(डॉक्टर) दुर्गाशंकर नागर,

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ॐ श्री शिवः शरणम्

आमुख ।

परमगुरु श्री गौडपादाचार्य महाराज का सम्मत अजातवाद तथा भगवत्पाद श्री आद्य शंकराचार्य महाराज का सम्मत विवर्तवाद दोनों को पर्यायभूत सिद्धांत समझना, सामान्य जनता की बुद्धि को अगम्य है, इस लिए भगवत् पूज्यपाद महाराज ने उपासनादि द्वारा जनता की बुद्धि को विशद करने के लिए 'हरिमीडे' इत्यादि तत्तद्देवता के स्तोत्र बनाए। इन्हीं उत्तमोत्तम स्तोत्रों की पंक्ति में अग्रणीपद इस सौन्दर्य-लहरी को ही प्राप्त है। दृश्यमान जगत् की सत्यता जिनको प्रतीत होती है ऐसी जनता के सद्बोध के लिए अध्यारोपापवाद न्याय से अध्यारोप—समय में विवर्तवादी भगवत् पूज्यपाद को परिणामवाद मानना क्रमप्राप्त होने से सुसंगत ही है। इसी अध्यारोप दृष्टि से सौन्दर्य लहरी में सर्व जगत पूज्य भगवती की प्रार्थना की गई है जिस से भगवती का प्रसाद मिलेगा, तदनन्तर केनोपनिषद वर्णित प्रकार से उपासक को सत्यज्ञान लाभ होगा; अर्थात यह विवर्तवाद का ही परिणित स्वरूप है। विमर्शशाली विद्वानों को यह भलीभांति विदित है कि जगतगुरु के प्रादुर्भाव के समय में कादि, हादि उपासना तथा योगमार्ग तत्र तत्र प्रचलित थे, उसी को लेकर भगवती की महाराज ने प्रार्थना की है। यह क्रम उपनिषद सम्मत है क्यों कि छांदोग्यादि उपनिषदों में कर्मठों की सम्मत उद्गीथादि उपासना कही गई हैं। स्पष्टार्थ से केवल भगवती के अंगप्रत्यंगों का वर्णन सौन्दर्य लहरी से प्रतीत होता है परन्तु अभियुक्त टीकाकारों ने तंत्रशास्त्र तथा

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वह अतीव सराहनीय है इस शिव ताण्डव ने सचमुच सोने में सुगंध वाली कहावत चरितार्थ की है यह परम समाधान की बात है ।

अन्त में सर्वोपकारक ग्रंथकार का अभिनन्दन करके इस अल्प निवेदन का विराम करते हैं ! इतिशम्

सर्वेषां विधेयः
शंकरानन्द भारती यति
मु. मोरटक्का रेवातीर
पूर्वाश्रमीः—महामहोपाध्याय—वेदान्तवागीश
श्री० श्रीधरशास्त्री पाठक
डेक्कन कॉलेज पूना

नोटः—श्री स्वामीजी के निवास स्थान मुकाम मोरटक्का के निकट नर्मदातट पर खेडीघाटस्थ श्री राजराजेश्वरी मन्दिर में प्रतिष्ठित श्रीमच्छंकर भगवत्पाद की प्रतिमा का फोटो इस ग्रंथ के प्रथम पृष्ठ पर दिया जाता है । लेखक उसके लिये और श्री स्वामीजी के इन भावपूर्ण उद्गारों के लिये श्री भालचंद्र शास्त्रीजी का बहुत आभारी है ।

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