स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in context९० स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri उतर कर, सांसारिक प्रमेय, प्रमाण, १प्रमाता और प्रमा की विचित्रताओं से भरे हुए, प्रमेय विश्व के रूप में ही स्पन्दायमान रहती है। शास्त्रीय शब्दों में इस अवस्था को अधिष्ठेय- अवस्था कहते हैं क्योंकि इसमें, २मन में अन्तःसकल्पात्मक संवेदन के रूप में भासमान घट-पट आदि वेद्य पदार्थों के द्वारा ही, बाहर के स्थूल घट-पट आदि वेद्यपदार्थों का अवभासन हो जाता है । यही कारण है कि इसमें मानसिक संकल्परूप घट-पट आदि वेद्यभाव अधिष्ठाता पदवी पर और उनके द्वारा अवभासित होने वाले बाह्य स्थूल घट-पट आदि वेद्यभाव अधिष्ठेय पदवी पर अवस्थित रहते हैं । जाग्रत्-अवस्था में, अन्तःसंवेदन के रूप में वर्तमान वेद्य पदार्थों का बाह्य स्थूल वेद्य पदार्थों के रूप में अवभासित होना आवश्यक है क्योंकि तभी तो इस अवस्था की सार्थकता मानी जाती है । इस कारण से यह अवस्था प्रति समय अधिष्ठेय-अवस्था ही कही जाती है । यह ३कभी भी अधिष्ठातृ-अवस्था नहीं बन सकती है । इस अवस्था में शक्ति (स्पन्दमयी विमर्शशक्ति) ज्ञेयरूप में ही विलासमान रहती है अतः सावधान पुरुषों को ज्ञेयता में ही स्वरूप की अनुभूति होती रहती है । मुख्य स्वप्न-अवस्था--मुख्य स्वप्नावस्था में संवित्-भट्टारिका वैकल्पिक ज्ञानरूप में ही स्पन्दित होती हुई, ४जाग्रत्-अवस्था के ही घट पट आदि ज्ञेय पदार्थों को मानसिक संकल्परूप में इस प्रकार सुस्पष्ट रूप में अवभासित कर लेती है कि मानो प्रमाता, जाग्रत्- अवस्था के समान ही, बाह्य इन्द्रियों के द्वारा उनका ग्रहण कर रहा हो । शास्त्रों के अनुसार जहां जाग्रत्-अवस्था को ज्ञेयप्रधानता के कारण प्रमेय पद कहते हैं, वहाँ स्वप्नावस्था को वैकल्पिक ज्ञानप्रधानता के कारण ५प्रमाण पद कहते हैं । प्रमाण पद होने का अभिप्राय यह है कि इस अवस्था में अनुभवित्ता के मानसिक संकल्प, स्थूल घट पट आदि वेद्य पदार्थों की वास्तविक स्थिति के अभाव में भी, संकल्परूप में उनकी छाया६ को अवभासित करते हैं । १. इस प्रमाता शब्द से संसार भूमिका पर अवस्थित पशुवर्ग का अभिप्राय है । संसार का पशुवर्ग चेतन होने पर भी विश्वात्मक संवित् की अपेक्षा से प्रमेय वर्ग में ही अन्तर्भूत हो जाता है । २. तथा हि भासते यत्तन्नीलमन्तःप्रवेदने । संकल्परूपे बाह्यस्य तदधिष्ठातृबोधकम् ।। यत्तु बाह्यतया नीलं चकास्त्यस्य न विद्यते । कथञ्चिदप्यधिष्ठातृभावस्तज्जाग्रदुच्यते ॥ (तं०, १०.२३४-३५) ३. यदधिष्ठेयमेवेह नाधिष्ठातृ कदाचन । संवेदनगतं वेद्यं तज्जाग्रत्समुदाहृतम् ।। (तत्रैव १०.२३१) ४. यत्त्वधिष्ठानकरणभावमध्यास्य वर्तते । वेद्यं सत्पूर्वकथितं भूततत्त्वाभिधामयम् । तत्स्वप्नो मुख्यतो ज्ञेयं तच्च वैकल्पिके पथि ॥ (तं०, १०.२४७-४८) ५. मानभूमिरियं मुख्या स्वप्नो ह्यत्र प्रमाणकः । (तत्रैव, १०.२४८) ६. मेयच्छायावभासिनी मानप्रधाना स्वप्नावस्थेयमित्यर्थः । (तं० वि०, १०.२४८)