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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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९२ स्पन्दकारिका शिवभाव में प्रविष्ट होने का सिंहद्वार है और यहाँ पर पहुँचे हुए साधक की सारी मायकीय उदासीनतायें सदा सर्वदा के लिये शान्त हो जाती हैं। इसी अवस्था को, स्पन्दशास्त्र के पारिभाषिक शब्दों में, ज्ञान-क्रिया की शाश्वतस्पन्दमयी विमर्श-भूमिका अथवा शाक्त-भूमिका कहते हैं। सामान्य स्पन्द-भूमिका होने के कारण इसका कोई विशिष्ट नामकरण सम्भव नहीं है अतः शास्त्रों में इसको 'तुर्या' अर्थात् चौथी अवस्था की संज्ञा देकर ही संतोष किया गया है। साथ ही यह समझना भी आवश्यक है कि इस अवस्था को मुख्य या अमुख्य अवस्था भी नहीं कहा जा सकता है। इसका कारण यह है कि पूर्ण चिन्मात्ररूप होने के कारण यह अवस्था, स्वयं ही, जाग्रत् आदि पूर्वोक्त तीन अवस्थाओं में व्याप्त रहकर, उनको ^१जीवन देती है; अतः वे अपने मिश्रण से इसमें मुख्यता या अमुख्यता कैसे उत्पन्न कर सकती हैं ? वास्तव में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति ये तीन अवस्थायें, अन्ततो गत्वा, इसी अवस्था में लय हो जाती हैं और उस लयीभाव की प्रक्रिया यह है कि ^२प्रमेय प्रमाण में, प्रमाण प्रमाता में और प्रमाता प्रमा में लय होकर कृतकृत्य हो जाते हैं। प्रमाता में अन्तः-बहिः पूर्ण शाक्तसमावेश हो जाता है अतः यह अवस्था साक्षात् ^३शाक्तसमावेशात्मक अभेदव्याप्ति की ही अवस्था है। इस प्रकार चारों अवस्थाओं के स्वरूप-विश्लेषण से निम्नलिखित निष्कर्षों पर पहुँचा जा सकता है— १. जाग्रत्-अवस्था में शक्ति की स्फुरणा का रूप ज्ञेयता है। २. स्वप्न-अवस्था में शक्ति की स्फुरणा का रूप संकल्प-विकल्पात्मक ज्ञप्ति है। ३. सुषुप्ति-अवस्था में शाक्त-स्फुरणा का रूप चिन्मय है परन्तु ज्ञेयता संस्कार रूप में अवशिष्ट रहने के कारण पूर्ण चिन्मय नहीं है। ४. तुर्या-अवस्था में ज्ञेयता के संस्कार भी अवशिष्ट नहीं रहते हैं अतः इसमें शक्ति स्फुरणा का रूप पूर्ण चिन्मय है ॥१८॥ [ज्ञानी और विशेषस्पन्द] अगले सूत्र में यह उपदेश दिया जारहा है कि जिस भाग्यशाली योगी को, पूर्ण शाक्त- समावेश हो जाने के फलस्वरूप, प्रत्येक अवस्था में, सामान्य-स्पन्दात्मक स्वभाव की अनुभूति होती रहती हो, उसके मार्ग में विशेष-स्पन्दों के अनन्त प्रवाह कोई बाधा नहीं डाल सकते हैं— गुणादिस्पन्दनिःष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् । लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥१९॥ १. .........'इति सैवैषा देवी विश्वैकजीवितम् । (तं०, १०. २६७) २. मेयं माने मातरि तत् सोऽपि तस्यां मितौ स्फुटम् । विश्राम्यति ।' (त०, ११. ३६७) ३. शक्तिसमावेशो ह्यसौ मतः । (तं०, १२. २६५)