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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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अज्ञान और विशेष स्पन्द ९७ तत्त्वरूपा १माया पशु को, जोकि वास्तव में शिव का ही अंश है, मौलिक चिन्मात्ररूप शिव- भाव से अलग करके, पहले निःसंज्ञ जैसा बना लेती है । निःसंज्ञ होने का यह अर्थ नहीं कि जीव शिव के अलग होने की दशा में पूर्णतया चेतनाहीन हो जाता है, अपितु इसका यह अभिप्राय है कि वह सशक्त एवं दुर्भेद्य मायीय आवरण के द्वारा आवृत होने के कारण पूर्णचेतना को खोकर, अंशतः, चेतना से युक्त रह जाता है और उसकी ऐसी दशा हो जाती है कि मानों गहरी नींद में पड़ा हुआ हो । निःसंज्ञ जैसा बन जाने की दशा में उसके निरंकुश ज्ञान-क्रिया के प्रसार में बाधा पड़ जाना भी स्वाभाविक ही है। पहले भी इस बात का ] उल्लेख किया जा चुका है कि पूर्ण शिवभाव के स्तर पर, शक्ति के चित्, निर्वृति, इच्छा, ज्ञान और क्रिया ये पांच मुख हैं और इसकी व्यापकता और प्रसार में कहीं कोई देशकालादि से जनित बाधा या सीमा नहीं है । इसके प्रतिकूल जहाँ एक ओर माया, अपने प्रभाव से पूर्ण-चेतन शिव को अंशतः चेतन पशु बनाकर संकुचित बना लेती है, वहाँ इन उपर्युक्त पांच असीम शक्तियों को भी ससीम बना कर क्रमशः कला, विद्या, राग, काल और नियति इन पांच तत्त्वों के रूप में अवभासित कर लेती है । माया का आवरणात्मक प्रभाव, सर्वव्यापी होने के कारण, किसी भी पक्ष को अछूता नहीं रहने देता है क्योंकि उसी दशा में संसारभाव की चरितार्थता सिद्ध हो सकती है । प्राकृतिक प्रतिविधान के अनुकूल यही बात है कि अंशतः स्वतन्त्र पशु की शक्तियां भी अंशतः ही स्वतन्त्र अर्थात् दरिद्र होनी चाहिये । अस्तु, माया- तत्त्व सबसे पहले कलातत्त्व को जन्म देता है । यह २कलातत्त्व, मायीय प्रभाव से निःसंज्ञ जैसे बने हुए अणु में, संकुचित कर्तृत्त्वरूप चेतना का संचार करता है और उससे वह, जीवभाव के अनुकूल अत्यन्त सीमित रूप में, केवल सांसारिक आदान-प्रदान करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है । इसको पारिभाषिक शब्दों में किञ्चित्कर्तृत्व कहते हैं । इसके अनन्तर विद्यातत्त्व का आविर्भाव हो जाता है । ३यह तत्त्व इसको (अणु को), बुद्धिदर्पण में प्रतिबिम्बित सुख-दुःख आदि प्रत्ययों अथवा हान-आदान इत्यादिरूप कर्मजाल की विवेचना करने का, सीमित सामर्थ्य प्रदान करता है। इसको शैवशब्दों में किञ्चित्-ज्ञत्व कहते हैं। ४शैवदार्शनिकों का विचार यह है कि बुद्धि स्वतः जड़ होने के कारण स्वयं सुख-दुःख आदि प्रत्ययों का विवेचन नहीं कर सकती है । फलतः यह विद्यातत्त्व ही है जिसके द्वारा, प्रत्येक जीव इन्द्रियों की सरणियों से बुद्धिदर्पण में प्रतिबिम्बित सुख-दुःख आदि विषयों की पारस्परिक भिन्नता का विश्लेषण कर

१. माया हि चिन्मयाद् भेदं शिवाद्द्विदधती पशोः । सुषुप्ततामिवाधत्ते तत एव हृद्दृक्क्रियः ॥ (तं०, ९.२७५) २. असूत सा कलातत्त्वं यद्योगादभवत् पुमान् । जातकर्तृत्वसामर्थ्यो .... .... .... .... ... ॥ (मा० वि०, १.२७) ३. विद्या विवेचयत्यस्य कर्म तत्कार्यकारणे । (मा० वि०, १.२८) ४. बुद्धि के विषय में शैवों और सांख्यों के दृष्टिकोण की भिन्नता समझने के लिए द्रष्टव्य तं० : ९.१११-९८ ७