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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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आत्मसत्ता और संवेद्य विषय ११६ अनुवाद सूत्र- जीव (पशुप्रमाता) सर्वमय ही है क्योंकि यह भी (पतिप्रमाता की तरह) संसार के सारे (घट, सुख इत्यादि) भावों के साथ संवेदनात्मक तादात्म्य प्राप्त करके उनकी १सर्जना करता रहता है ॥ २८ ॥ वृत्ति- यह जीवात्मा सर्वमय है क्योंकि यह निजी संवेदन के द्वारा संसार के प्रत्येक भाव की सर्जना करता रहता है। जो ही पदार्थ अनुभव में आता है वही संवेदन का विषय बन जाता है। यह (जीवात्मा) किसी भी बाह्य पदार्थ का अनुभव करने के बाद तत्काल ही, उसको अपने शरीर के रूप में ग्रहण कर लेता है। अतः इसका वही एक शरीर नहीं होता है जिसके साथ सिर, पैर इत्यादि अंगों के चिह्न लगे हुये हों ॥ २८ ॥ सूत्र- अतः सारे वाचक और वाच्यरूप पदार्थों की संवेदनाओं की कोई भी ऐसी अवस्था नहीं जो शिवरूप नहीं है। वास्तविक स्थिति यह कि प्रत्येक स्थान पर भोक्ता (आत्मा) ही भोग्य (प्रमेय) पदार्थों के रूप में उल्लसित होकर शाश्वतरूप में वर्तमान है ॥ २९ ॥ वृत्ति- आत्मा का वैसा सर्वमय स्वभाव होने के कारण, शब्दों और अर्थों की संवे- दनाओं की कोई भी ऐसी अवस्था नहीं जो शिवमम स्वभाव को अभिव्यक्त करने वाली नहीं है। अतः वस्तुस्थिति यही है कि प्रत्येक स्थान पर भोक्ता (वेदक सत्ता) ही भोग्य पदार्थों (वेद्यसत्ता) के रूप में आभासमान है। भोग्य पदार्थ चेतन भोक्ता से इतर नहीं हैं ॥ २९ ॥ सूत्र- जिस योगी के संवेदन का ऐसा रूप विकास में आया हो, वह सारे विश्व को केवल अपनी खिलकौरी के रूप में देखता हुआ, नित्ययुक्त (स्वरूप के साथ तन्मय) हो जाता है। अतः इस बात में कोई संशय नहीं कि वही पुरुष जीवन्मुक्त है ॥ ३० ॥ वृत्ति- जिस योगी के चित्त का ऐसा स्वभाव विकास में आया हो कि 'यह समूचा विश्व मेरा ही स्वरूप है', वह समूचे प्रमेयविश्व को अपने खिलौने के रूप में देखता हुआ, २नित्ययुक्त होने के कारण, पाञ्चभौतिक काया में रहता हुआ भी ईश्वर की तरह मुक्त है। ऐसे व्यक्ति के लिये शरीर इत्यादि की वर्तमानता बन्धक के रूप में नहीं होती है ॥ ३० ॥ विवरण प्रस्तुत सूत्रों में आत्मसत्ता की वास्तविक सर्वमयता का मन्तव्य प्रस्तुत किया गया है। इस मन्तव्य के अनुसार संसारी जीव भी वैसा ही विश्वशरीरी है जैसा कि स्वयं भगवान् शिव है। जिसप्रकार भगवान् अपनी नित्यस्पन्दमयी विमर्शशक्ति के द्वारा अनन्त प्रकार के वेदकों और वेद्योँ से परिपूर्ण विश्व को सत्ता देकर, उसको अपने शरीर के रूप में धारण करके अव- स्थित है, उसी प्रकार जीव भी पग पग पर अपने संवेदन के द्वारा प्रत्येक प्रकार के भूतात्मक या भावात्मक पदार्थों को सत्ता देकर, उनको अपने शरीर के रूप में ग्रहण करता हुआ अव- १. स्पन्दशास्त्र में 'सृष्टि' शब्द से सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह इन पाँचों कृत्यों का अभिप्राय लिया जाता है। २. प्रतिसमय स्वरूपसत्ता के साथ आंतरिक रूप में जुड़ा हुआ।