स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in context१२४ स्पन्दकारिका इसके अतिरिक्त भट्टकल्लट ने इसी सूत्र में उल्लिखित 'इच्छतः' शब्द का अर्थ मन्त्र का उच्चारण करने की इच्छा लगाया है । इस सम्बन्ध में यह समझना आवश्यक है कि किसी भी शब्द का उच्चारण करते समय उच्चारण की दो स्थितियाँ सक्रिय होती हैं । एक अव्यक्त ध्वनिरूपा आन्तरिक विमर्शमयी और दूसरी उसकी अनुगामिनी व्यक्त ध्वनिरूपा बाह्य वैखरीमयी स्थिति । इनमें से पहली विमर्शमयी स्थिति मूलभूत इच्छारूपा स्थिति होती है । यद्यपि यह स्थिति प्रतिसमय प्रत्येक प्राणी के अन्तस् में क्रियाशील रहती है परन्तु बहिर्मुख होने के कारण वह उससे सचेत नहीं होता है । प्रस्तुत प्रकरण में मन्त्रोच्चारण के सम्बन्ध में, मन्त्रोच्चारण की इसी पहली 'विमर्शमयी अथवा इच्छारूपा स्थिति का ही अभिप्राय है क्योंकि शाक्त-उपाय पर चलने वाले साधकों की सारी क्रियायें विमर्शमयी ही होती हैं। वैखरीवाणी के द्वारा ऊँची आवाज़ में मन्त्रों का उच्चारण करना आणव उपाय पर चलने वाले अवर अधिकारियों के लिये ही लाभप्रद सिद्ध हो सकता है । मन्त्रों के विमर्शमय उच्चारण में इतनी शक्ति होती है कि साधक का चित्त और परप्रकाशरूप २बिन्दु, उसी प्रकार तीव्रगति से एक दूसरे की ओर आकर एकाकार हो जाते हैं, जिस प्रकार धनुष के प्रचण्ड आघात से धकेला गया तीर अतिस्वनिक वेग में दौड़ कर लक्ष्य के साथ मिल जाता है । सूत्र संख्या ३२ में 'निर्वाण दीक्षा' का उल्लेख किया गया है । इस सम्बन्ध में निम्नलिखित बातें ध्यान में रखना आवश्यक है । आध्यात्मिक जगत् में 'दीक्षा' शब्द से ऐसे विशेष प्रकार के संस्कारों का अभिप्राय लिया जाता है जिनके द्वारा सिद्ध गुरु अपने शिष्यों में, उनकी मानसिक योग्यताओं के अनु- सार, अनेक प्रकार की योग सम्बन्धी अनुभूतियों को संक्रमित करके, पलक भर में उनका उद्धार कर लेते हैं । शास्त्रों के अनुसार ३'दीक्षा' शब्द के 'दी' वर्ण में ज्ञान के संक्रमण और 'क्षा' वर्ण में कर्मवासनाओं का नाश किये जाने का अभिप्राय अन्तर्निहित है । तन्त्रशास्त्रों में अनेक प्रकार की दीक्षाओं और उनके साथ सम्बन्धित शास्त्रीय विधि- विधानों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । शिष्यों की मानसिक योग्यताओं को अच्छी प्रकार जांचने के अनन्तर ही गुरु यह निर्णय कर लेता है कि किस शिष्य को कैसी दीक्षा देना उचित है । सारी दीक्षाओं में 'निर्वाण-४दीक्षा' असामान्य और दुर्लभ मानी जाती है क्योंकि जिस १. उच्चारेण विमर्शरूपेण न तु स्थानकरणप्रयत्नरूपबीजाक्षरोच्चारेण, तस्याणवोपायपर्यव- सायित्वात् । (शिवसूत्रवि०, २.२ की टिप्पणी) २. यथा शरो धनुःसंस्थो यत्नेनाताड्य धावति । तथा बिन्दुर्वरारोहे! उच्चारेणैव धावति ।। (तं० सं०, शिवसूत्र, २.२ में उदाहृत) ३. दीयते ज्ञानसद्भावः क्षीयन्ते कर्मवासनाः । दानक्षपणसंयुक्ता दीक्षा तेनेह कीर्तिता ।। (तं० वि०, १.४३) ४. तथा इयमेव निर्वाणदीक्षा.........संस्कारविशेषः । (स्प० का०, ४२)