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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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योगियों का स्तर और स्वातन्त्र्य १२७ अन्यथा तु स्वतन्त्रा स्यात् सृष्टिस्तद्धर्मकत्वतः । सततं लौकिकस्येव जाग्रत्स्वप्नपदद्वये ॥३५॥ यथास्यानभिव्यक्तस्वस्वरूपस्य योगिनो जाग्रदवस्थायां यथा यथा इच्छा भवति, तथैव तस्यानेकार्थसंनिधानेऽभिमतस्यैव कस्यचिदर्थस्य दर्शनं भवति नटमल्ल- प्रेक्षादिषु सोमसूर्योदयं कृत्वा चक्षुरादिष्ववधानेन ॥३३॥ तथा स्वप्नेऽपि अभीष्टार्थानिव पश्यति, प्रणयस्यानतिक्रमात् इच्छाभ्यर्थनाया अनतिक्रमात्, यच्च तन्मध्ये हृदयं स्फुटतरम् अभिव्यक्तम् नित्यं तदेतत् 'स्वप्न-स्वा- तन्त्र्यम्' इत्युच्यते, अयमेव तमोवरणनिर्भेद इत्यर्थः ॥३४॥ अन्यथा तु स्वरूपस्थित्यभावे स्वतन्त्रा स्यात् स्वप्ने आलविडालदर्शनरूपा सृष्टिः, यस्मात् तत्तत्त्वं सृ ष्टिस्र्वभावं प्रसवधर्मत्वात्; यथा सततं सर्वस्य लोकस्य जाग्रद्- वृत्तौ स्वप्नावस्थायां च संबन्धासंबन्धविकल्पाः ॥३५॥ अनुवाद सूत्र—जिस प्रकार—१धाता, अभी २देहाभिमान में ही अवस्थित परन्तु नियमित रूप में योगाभ्यास करनेवाले योगी के द्वारा, (संकल्पात्मक) इच्छा के रूप में ३अभ्यर्थना किये जाने पर, उसके ४नेत्रों में अत्यन्त तीव्र अवधानात्मक शक्ति का उदय करके, उसको जाग्रत्- अवस्था में उन्हीं पदार्थों का दर्शन करवाता है जिनको देखने की इच्छा उसके हृदय में हो ॥३३॥ उसी प्रकार— सूत्र—(परिपक्व योगियों को) स्वप्न-अवस्था में भी अवश्य अभिलषित पदार्थों का ही साक्षात्कार करवाता है। इसका कारण यह है कि (वह धाता इस स्तर पर अवस्थित योगियों १. प्रत्येक प्राणी के अन्तर्हृदय में विद्यमान चित्-शक्ति। २. सूत्र में उल्लिखित 'देहिनः' शब्द से भट्टकल्लट ने यही अभिप्राय लिया है यद्यपि अन्य कतिपय टीकाकारों ने इस शब्द का अर्थ 'सर्वसाधारण देहधारी' ही लगाया है। ३. प्रस्तुत प्रकरण में योगी की आन्तरिक इच्छारूप अभ्यर्थना से उसके संकल्पमात्र का अभिप्राय है। इस स्तर के योगियों का योगिसंकल्पात्मक अभ्यर्थना को पारिभाषिक शब्दों में 'दिदृक्षारूपा अभ्यर्थना' कहा जाता है। ४. सूत्र में उल्लिखित 'सोमसूर्य' शब्द से भट्टकल्लट ने दो नेत्रों का अभिप्राय लिया है। साथ ही इसी से नेत्रों के अतिरिक्त अन्य अवशिष्ट चार ज्ञानेन्द्रियों का भी ग्रहण करके यह अभिप्राय निकाला है कि योगी को जिस किसी भी ज्ञानेन्द्रिय के ग्राह्य विषयों में से किसी मनोनीत विषय का साक्षात्कार करने की इच्छा हो तो धाता उसकी उसी ज्ञानेन्द्रिय में तदनुकूल अवधानात्मक शक्ति का उदय कर देता है।