स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in context१३६ स्पन्दकारिका स्वयं नष्ट हो जाती हैं । यही कारण है कि योगियों के शरीर १वलीपलितादि से रहित, तेजस्वी और स्वस्थ हुआ करते हैं :— ग्लानिर्विलुम्पिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः । तदुन्मेषविलुप्तं चेत् कुतः सा स्यादहेतुका ॥४०॥ ग्लानिः किल शरीरस्य विनाशिनी । सा च ग्लानिरज्ञानादुत्पद्यते । तदज्ञानम् उन्मेषेणात्मस्वभावेन यदि नित्योञ्झितं तदा सा कुतः, कारणरहिता भवेत् ? अनेनैव कारणेन वलीपलिताभावः शरीरदार्ढ्यं च योगिनाम् ॥४०॥ एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥४१॥ एकत्र विषये व्यापृतचित्तस्य यतो यस्मात् स्वभावात् झगित्यन्या चिन्तोत्पद्यते, स चिन्तायाः कारणम् उन्मेषो ज्ञातव्यः । स तु स्वयमेव योगिना लक्षणीयः, चिन्ता- द्वयान्तर्व्यापकतयानुभूयमानः ॥४१॥ अनुवाद सूत्र—मानसिक उदासीनता, शरीर में ( धातु, सामर्थ्य, उत्साह, तेज इत्यादि ) सब कुछ चौपट कर देने वाली होती है वह स्वयं अज्ञान से ही प्रसार में आती है । यदि उन्मेष के द्वारा अज्ञान का समूल उच्छेद किया जाये तो वह, कारण के न रहने पर, कहां से उत्पन्न हो सकती है ? ॥ ४० ॥ वृत्ति—ग्लानि अर्थात् मानसिक शिथिलता या उदासीनता निश्चयपूर्वक शरीर अर्थात् शरीर के धातु, बल, तेज इत्यादि का नाश करने वाली होती है । वह स्वयं केवल अज्ञान से ही उत्पन्न हो जाती है । यदि उन्मेष अर्थात् चित्-चमत्कारमय स्वरूप विकास के उपाय से उस अज्ञान का सदा के लिये उच्छेद किया जाये तो वह कहाँ से पैदा हो सकती है ? क्योंकि उसके पैदा होने का कोई कारण ही नहीं रहता है । यही कारण है कि योगियों के शरीर दृढ़ होते हैं । उनमें न कभी झुर्रियां ही पड़ पाती हैं और न कभी उनके बाल ही पक पाते हैं ॥ ४० ॥ सूत्र—किसी व्यक्ति का चित्त कभी किसी एक प्रकार की चिन्ता में डूबा हुआ होता है और तत्काल ही उसमें जिस अलक्षित आत्मबल से सहसा दूसरी चिन्ता उभर आती है उसको (आत्म-बल के आकस्मिक विकास को) उन्मेष समझना चाहिये । उस तत्त्व की, निजी अनुसन्धान के द्वारा, स्वयं टोह लगानी चाहिये ॥४१॥ वृत्ति—यदि किसी चिन्तक का चित्त किसी एक विषय के साथ सम्बन्ध रखने वाली चिन्ता में एकाग्रभाव से डूबा हुआ हो, तो उसमें जिस स्वभाव के द्वारा सहसा कोई दूसरी चिन्ता उभर आती है, उस दूसरी चिन्ता के उत्पन्न होने का कारण उन्मेष समझना चाहिये । १. बुढ़ापा या अन्य कारणों से मुख में झुर्रियां पड़ना और बालों का सफेद हो जाना ॥