स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
Page 83 of 190
Read in contextअभावब्रह्मवाद, सर्वशून्यत्ववाद की निःसारता ७३ जबकि शेष जगत् संवृत्तिसत्य१ है। प्रत्येक प्रकार के स्वभाव अथवा लक्षण इत्यादि से परे होने के कारण शून्यदशा अनिर्वाच्य है परन्तु इस पर पहुँचना ही सारी साधना का अन्तिम लक्ष्य है। इस सर्वशून्य भाव की अनुभूति को ही बौद्ध शब्दों में 'निर्वाण' की संज्ञा मिली है। महाप्रज्ञा से ऐसे निर्वाण की प्राप्ति सम्भव हो सकती है और उसके प्राप्त करने से ही पूर्णतया क्लेशों का क्षय हो जाता है। प्रसिद्ध बौद्धदार्शनिक और कवि अश्वघोष ने इस सर्वशून्यरूप निर्वाण को शान्ति का नाम दिया है। उसके मन्तव्यानुसार, जिस प्रकार २दीये की लौ बुझ जाने पर न भूमि में, न आकाश में, न किसी दिशा में और न किसी विदिशा में चली जाती है प्रत्युत तेल का क्षय हो जाने पर केवल शान्त हो जाती है, उसी प्रकार योगी की आत्मा निर्वृति पर पहुँच कर न भूमि में, न आकाश में, न किसी दिशा में और न किसी विदिशा में चली जाती है प्रत्युत क्लेशों का क्षय हो जाने से केवल शान्ति की अवस्था में लय हो जाती है। यदि शैव सिद्धान्त को मन में रखकर इन दोनों मतावलम्बियों के विचारों का अनु- शीलन किया जाये तो मस्तिष्क में कई बातें सहज ही में उभर आती हैं— अभावब्रह्मवाद के अनुसार यदि आत्मा का वास्तविक 'स्वरूप' अभाव मान कर उससे किसी भी प्रकार की सत्ता के अनस्तित्व का सिद्धान्त स्वीकारा जाये तो एक बाधा उपस्थित होती है। वह यह कि अभावदशा में किसी भी वेदकसत्ता ( ज्ञान-क्रियात्मक अनुभवित्ता ) का अस्तित्व शेष न रहने के कारण उस अभाव दशा का अनुभव कौन कर सकता है ? साथ ही 'अभाव' से यदि पदार्थों की असत्ता का अभिप्राय है तो ऐसे अभाव से भावरूप जगत् कैसे उदय में आ सकता है ? क्योंकि असत से सत् की उत्पत्ति होना न तो सम्भव है और न ऐसी कल्पना करना ही तर्क-संगत है। यदि यह माना जाये कि भावरूपता को जन्म देना और फिर उसको अभावरूपता में लय करना ही 'अभाव' का स्वभाव है तो ऐसे ३स्वभाव की विद्यमानता में उसको सर्वाभाव कैसे माना जा सकता है ? फलतः पहले अभाव का स्वरूप ही स्पष्ट नहीं हो जाता है। अभावसमाधि का उपदेश देनेवाले गुरुओं का कथन है कि तब तक अभाव की भावना अर्थात् 'मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ' इस प्रकार की भावना का अभ्यास करते रहना चाहिये जब तक आत्मा स्वयं भी अभावरूप ही बन जाये। इस विषय में यह बात विचारणीय है कि भावना का विषय वही वस्तु बन सकती है जिसकी स्वतः अखण्डित सत्ता विद्यमान हो। जब अभाव प्रत्येक भाव अर्थात् सत्ता का अनस्तित्व है तो वह भावना का विषय क्यों कर बन सकता है ? १. व्यवहार मात्र से कहा सुना जाने वाला यथार्थ। २. दीपो यथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम्। दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चित् स्नेहक्षयात्केवलमेति शान्तिम् ॥ योगी तथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् । दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चित् क्लेशक्षयात्केवलमेति शान्तिम् ॥ (सौन्दरनन्द, १६.२८-२९) ३. नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ॥ ( भ० गी०, २.१७ )