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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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८४ स्पन्दकारिका वर्तमानता से ही पकाने की क्रिया निष्पन्न हो सकती है। पारमार्थिक स्तर पर भी यही सिद्धान्त लागू हो जाता है। इस शाश्वत 'कर्तृत्व' का स्वरूप अहंविमर्शात्मक स्पन्द है। दूसरे शब्दों में इसको 'विमर्शशक्ति' भी कहते हैं। विमर्शशक्तिरूप 'कर्तृत्व' ही एक ऐसा अनिर्वचनीय 'भाव' है जो कि विश्व के अणु अणु को सत्ता प्रदान करने वाला सारभूत चैतन्य है। भगवान् उत्पलदेव ने इस भाव अथवा अहंविमर्शात्मक स्फुरण को '१महासत्ता' का नाम दिया है क्योंकि यही सारे जड़ अथवा चेतन भावों की विश्रान्ति का स्थान अर्थात् 'हृदय'२ है। जड़ भावों की विश्रान्ति का स्थान चेतन है। चेतनों का आधार प्रकाशमानता है परन्तु स्वयं प्रकाश की प्रकाशमानता का रहस्य भी विमर्श में ही अन्तर्निहित है। यह तो ३विमर्श- रूप स्पन्दना ही है जो कि स्वयं अदेशकालकलित होने के कारण, विभिन्न एवं विचित्र प्रकार के देश, काल एवं आकारों से परिकलित प्रमेयवर्ग को जीवन देकर, स्वयं उन उन रूपों में निरर्गल क्रीड़ा करती रहती है। यद्यपि खरगोश के सींग या आकाश के फूल जैसी कल्पनाओं का प्रत्यक्षरूप में कहीं भी अस्तित्व नहीं है परन्तु विमर्श में इनकी भी सत्ता ठीक उसी प्रकार विद्यमान है जिस प्रकार दृश्यमान पदार्थों की है। फलतः यह ऐसा शाश्वत भाव है जिसमें अभाव भी अन्तर्निहित है। सूत्र १ में इस बात का उल्लेख किया गया है कि कोई भी क्रिया ज्ञान के बिना सम्भव नहीं हो सकती है। ज्ञान का मौलिकरूप स्वतन्त्र इच्छा है। अतः प्रस्तुत प्रकरण में वर्णित 'कर्तृत्व' अथवा 'भाव', स्वतन्त्र एवं अकालकलित इच्छा; ज्ञान और क्रिया की समरसता है, इसी को शैवशब्दों में चित्-रूपता कहते हैं ॥१६॥ [प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध की अनुभूति] अब यहाँ से अगले कई सूत्रों में इसी चिन्मात्ररूप स्वभाव के अनुभवपक्ष पर प्रकाश डाला जा रहा है। इस सम्बन्ध में सर्वप्रथम अगले सूत्र में सुप्रबुद्ध और प्रबुद्ध योगियों में पाई जाने वाली आध्यात्मिक अनुभूति के स्तर में तारतम्य दिखाने के साथ-साथ, सूत्र में अन्तर्निहित व्यंग्य के द्वारा, इस रहस्य का उद्घाटन किया जा रहा है कि प्रबुद्ध भूमिका पर अवस्थित योगी को सुप्रबुद्ध-भाव प्राप्त करने के लिये गुरूपदेश की आवश्यकता होती है :— तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदान्यभिचारिणी । नित्यं स्यात् सुप्रबुद्धस्य, तदाद्यन्तेऽपरस्य तु ॥१७॥ १. सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी । सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥ (ई० प्र०, १.५.१४) २. हृदयं च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तच्च उक्तनीत्या जडानां चेतनम्, तस्यापि प्रकाशात्म- त्वम्, तस्यापि विमर्शशक्तिः । (ऊपर के सूत्र पर विमर्शिनी टीका) ३. महासत्ता महादेवी विश्वजीवनमुच्यते । (ऊपर के सूत्र में उदाहरण)