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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

Page 257 of 834

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Page 257

अध्याय ६१] ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूपका वर्णन २५५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एते तारा ग्रहाश्चापि बोद्धव्या भार्गवादयः।<br>जन्मनक्षत्रपीडासु यान्ति वैगुण्यतां यतः॥ ४९<br>मुच्यते तेन दोषेण ततस्तद् ग्रहभक्तितः।<br>सर्वग्रहाणामेतेषामादिरादित्य उच्यते॥ ५०<br>ताराग्रहाणां शुक्रस्तु केतूनां चापि धूमवान्।<br>ध्रुवः किल ग्रहाणां तु विभक्तानां चतुर्दिशम्॥ ५१<br>नक्षत्राणां श्रविष्ठा स्यादयनानां तथोत्तरम्।<br>वर्षाणां चैव पञ्चानामाद्यः सम्वत्सरः स्मृतः॥ ५२<br>ऋतूनां शिशिरश्चापि मासानां माघ उच्यते।<br>पक्षाणां शुक्लपक्षस्तु तिथीनां प्रतिपत्तथा॥ ५३<br>अहोरात्रविभागानामहश्चादिः प्रकीर्तितः।<br>मुहूर्तानां तथैवादिर्मुहूर्तो रुद्रदैवतः॥ ५४इन शुक्र आदि ग्रहोंको ताराके नामसे भी जानना चाहिये। ये अपने-अपने जन्म-नक्षत्रोंमें उत्पन्न पीड़ाओंमें वैगुण्यताको प्राप्त होते हैं, तब उस ग्रहकी पूजा करनेसे मनुष्य उस दोषसे मुक्त हो जाता है। इन सभी ग्रहोंमें आदित्य (सूर्य) आदि (प्रधान) ग्रह कहा जाता है। ताराग्रहोंमें शुक्र, केतुओंमें धूमवान् तथा चारों दिशाओंमें विभक्त ग्रहोंमें ध्रुव प्रधान है। नक्षत्रोंमें धनिष्ठा और अयनोंमें उत्तरायण प्रधान है। पाँचों वर्षोंमें संवत्सरको प्रधान कहा गया है। ऋतुओंमें शिशिर तथा मासोंमें माघको आदिमास कहा जाता है। पक्षोंमें शुक्लपक्ष और तिथियोंमें प्रतिपदा प्रधान है। दिन तथा रातके विभागोंमें दिनको आदि कहा गया है। मुहूर्तोंमें रुद्रदैवत आदिमुहूर्त है॥ ४९—५४॥
क्षणश्चापि निमेषादिः कालः कालविदां वराः।<br>श्रवणान्तं धनिष्ठादि युगं स्यात्पञ्चवार्षिकम्॥ ५५<br>भानोर्गतिविशेषेण चक्रवत्परिवर्तते।<br>दिवाकरः स्मृतस्तस्मात्कालकृद्भूरिश्वरः॥ ५६<br>चतुर्विधानां भूतानां प्रवर्तकनिवर्तकः।<br>तस्यापि भगवान् रुद्रः साक्षाद्देवः प्रवर्तकः॥ ५७<br>इत्येष ज्योतिषामेवं सन्निवेशोऽर्थनिश्चयः।<br>लोकसंव्यवहारार्थं महादेवेन निर्मितः॥ ५८<br>बुद्धिपूर्वं भगवता कल्पादौ सम्प्रवर्तितः।<br>स आश्रयोऽभिमानी च सर्वस्य ज्योतिरात्मकः॥ ५९हे कालवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! क्षणोंमें निमेष आदिकाल है। धनिष्ठासे श्रवणपर्यन्त पाँच वर्षोंका युग होता है। भानुकी विशेष गतिके कारण जगत् चक्रकी भाँति परिवर्तित होता रहता है, इसलिये सूर्यको कालकी रचना करनेवाला, व्यापक तथा ईश्वर कहा गया है। सूर्य चारों प्रकारके प्राणियोंका प्रवर्तक एवं निवर्तक है और साक्षात् भगवान् रुद्रदेव उस (सूर्य)-के भी प्रवर्तक हैं। इस प्रकार महादेवने लोकव्यवहारके लिये नक्षत्रोंका अर्थनिश्चयवाला यह सन्निवेश निर्मित किया है। उन भगवान्ने ही कल्पके आरम्भमें बुद्धिपूर्वक इनका प्रवर्तन किया है। वे सबके आश्रय, अभिमानी तथा ज्योतिस्वरूप हैं॥ ५५—५९॥
एकरूपप्रधानस्य परिणामोऽयमद्भुतः।<br>नैष शक्यः प्रसंख्यातुं याथातथ्येन केनचित्॥ ६०<br>गतागतं मनुष्येण ज्योतिषां मांसचक्षुषा।<br>आगमादनुमानाच्च प्रत्यक्षादुपपत्तितः॥ ६१<br>परीक्ष्य निपुणं बुद्ध्या श्रद्धातव्यं विपश्चिता।<br>चक्षुः शास्त्रं जलं लेख्यं गणितं मुनिसत्तमाः॥ ६२<br>पञ्चैते हेतवो ज्ञेया ज्योतिर्मानविनिर्णये॥ ६३एक रूपवाले उन प्रधानका यह अद्भुत परिणाम है। यथार्थरूपसे इसका वर्णन किसीके द्वारा नहीं किया जा सकता है। भौतिक दृष्टिवाले विद्वान् मनुष्यको इन ज्योतिर्गणोंके प्रमाण तथा गतिके विषयमें आगम (वेद, शास्त्र), अनुमान, प्रत्यक्ष और उपपत्तिके द्वारा सावधानीपूर्वक बुद्धिसे परीक्षण करके इनपर श्रद्धा करनी चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! चक्षु, शास्त्र, जल, लेख्य तथा गणित—इन पाँचोंको नक्षत्रोंके प्रमाणके निर्णयमें साधन समझना चाहिये॥ ६०—६३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ग्रहसंख्यावर्णनं नामैकषष्टितमोऽध्यायः॥ ६१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ग्रहसंख्यावर्णन' नामक इकसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६१॥