श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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| ३७८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक | अर्थ |
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| शालके वा त्यजेत्प्राणांस्तथा वै जम्बुकेश्वरे।<br>शुक्रेश्वरे वा गोकर्णे भास्करेशे गुहेश्वरे ॥ ४२<br>हिरण्यगर्भे नन्दीशे स याति परमां गतिम्।<br>नियमैः शोष्य यो देहं त्यजेत्क्षेत्रे शिवस्य तु ॥ ४३<br>स याति शिवतां योगी मानुषे दैविकेऽपि वा।<br>आर्षे वापि मुनिश्रेष्ठास्तथा स्वायम्भुवेऽपि वा ॥ ४४<br>स्वयम्भूते तथा देवे नात्र कार्या विचारणा। | त्रिविष्टप, विमुक्त, केदारक्षेत्र, संगमेश्वर, शालक, जम्बुकेश्वर, शुक्रेश्वर, गोकर्ण, भास्करेश, गुहेश्वर, हिरण्यगर्भ तथा नन्दीशक्षेत्रमें प्राण छोड़ता है, वह परम गति प्राप्त करता है। हे श्रेष्ठ मुनियो ! [अपने] शरीरको नियमोंसे सुखाकर जो योगी मानुष (मानवस्थापित), दैविक (देवस्थापित), आर्ष (मुनि-स्थापित) या स्वयम्भू (स्वयं उत्पन्न) किसी भी शिवक्षेत्रमें प्राणत्याग करता है, वह शिवत्वको प्राप्त होता है। ज्योतिर्लिङ्ग-क्षेत्र तथा देवक्षेत्रके विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ३७-४४ १/२ ॥ |
| आधायाग्निं शिवक्षेत्रे सम्पूज्य परमेश्वरम् ॥ ४५<br>स्वदेहपिण्डं जुहुयाद्यः स याति परां गतिम्।<br>यावत्तावन्निराहारो भूत्वा प्राणान् परित्यजेत् ॥ ४६<br>शिवक्षेत्रे मुनिश्रेष्ठाः शिवसायुज्यमाप्नुयात्।<br>छित्त्वा पादद्वयं चापि शिवक्षेत्रे वसेत्तु यः ॥ ४७<br>स याति शिवतां चैव नात्र कार्या विचारणा। | शिवक्षेत्रमें भलीभाँति परमेश्वरकी पूजा करके आग जलाकर जो [प्राणी] अपने शरीरको उसमें होम कर देता है, वह परम गति प्राप्त करता है। हे श्रेष्ठ मुनियो ! जो [मनुष्य] निराहार रहकर शिवक्षेत्रमें प्राणका त्याग करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है। जो [अपने] दोनों पैरोंको काटकर भी शिवक्षेत्रमें निवास करता है, वह शिवत्वको प्राप्त होता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ४५-४७ १/२ ॥ |
| क्षेत्रस्य दर्शनं पुण्यं प्रवेशस्तच्छताधिकः ॥ ४८<br>तस्माच्छतगुणं पुण्यं स्पर्शनं च प्रदक्षिणम्।<br>तस्माच्छतगुणं पुण्यं जलस्नानमतः परम् ॥ ४९<br>क्षीरस्नानं ततो विप्राः शताधिकमनुत्तमम्।<br>दध्ना सहस्रमाख्यातं मधुना तच्छताधिकम् ॥ ५०<br>घृतस्नानेन चानन्तं शार्करे तच्छताधिकम्। | शिवक्षेत्रका दर्शन पुण्यदायक होता है, वहाँपर प्रवेश करना उससे सौ गुना अधिक पुण्यदायक होता है और उसका स्पर्श तथा प्रदक्षिणा उससे भी सौ गुना पुण्यप्रद होता है। वहाँपर [मूर्तिको] जल-स्नान करानेसे उससे भी सौ गुना पुण्य होता है। हे विप्रो ! दुग्धसे स्नान करानेसे उससे सौ गुना, दहीसे स्नान करानेसे उससे हजार गुना, मधुसे स्नान करानेसे उससे सौ गुना, घृतसे स्नान करानेसे उससे अनन्त गुना और शर्करासे स्नान करानेसे उससे भी सौ गुना अधिक पुण्य कहा गया है ॥ ४८-५० १/२ ॥ |
| शिवक्षेत्रसमीपस्थां नदीं प्राप्यावगाह्य च ॥ ५१<br>त्यजेद्देहं विहायान्नं शिवलोके महीयते।<br>शिवक्षेत्रसमीपस्था नद्यः सर्वाः सुशोभनाः ॥ ५२<br>वापीकूपतडागाश्च शिवतीर्था इति स्मृताः।<br>स्नात्वा तेषु नरो भक्त्या तीर्थेषु द्विजसत्तमाः ॥ ५३<br>ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः। | शिवक्षेत्रके समीपमें स्थित [किसी] नदीपर जाकर उसमें स्नान करके और अन्नका त्याग करके जो [अपना] शरीर छोड़ता है, वह शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। शिवक्षेत्रके समीपमें स्थित सभी सुन्दर नदियाँ, बावलियाँ, कुएँ तथा तालाब शिवतीर्थ कहे गये हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो ! उन तीर्थोंमें श्रद्धापूर्वक स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५१-५३ १/२ ॥ |
| प्रातः स्नात्वा मुनिश्रेष्ठाः शिवतीर्थेषु मानवः ॥ ५४ |