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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

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| ७३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग | | :--- | :--- |

| नैगमेशश्च भगवाँल्लोकपाला ग्रहास्तथा।<br>सर्वे नन्दिपुरोगाश्च गणा गणपतिः प्रभुः॥ १८<br>पितरो मुनयः सर्वे कुबेराद्याश्च सुप्रभाः।<br>आदित्या वसवः सांख्या अश्विनौ च भिषग्वरौ॥ १९<br>विश्वेदेवाश्च साध्याश्च पशवः पक्षिणो मृगाः।<br>ब्रह्मादिस्थावरान्तं च सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम्॥ २०<br>तस्मात्सर्वं परित्यज्य स्थापयेल्लिङ्गमव्ययम्।<br>यत्नेन स्थापितं सर्वं पूजितं पूजयेद्यदि॥ २१ | भगवान् नैगमेश, समस्त लोकपाल, ग्रह, नन्दी आदि गण, प्रभु गणपति, पितर, मुनिगण, कान्तिमान् कुबेर आदि यक्ष, सभी आदित्य, वसु, सांख्य, वैद्यश्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार, विश्वेदेव, साध्यगण, पशु, पक्षी और मृग—ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सब कुछ लिङ्गमें प्रतिष्ठित है, अतः सब कुछ छोड़कर यत्नपूर्वक यदि शाश्वत लिङ्गकी स्थापना करे, तो सबकी स्थापना हो जाती है और यदि पूजन करे, तो सबकी पूजा हो जाती है॥ १५-२१॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लिङ्गपूजनवर्णनं नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लिङ्गपूजनवर्णन' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥

सैंतालीसवाँ अध्याय

लिङ्गमूर्तिकी प्रतिष्ठाकी विधि

| सूत उवाच<br>इति निशम्य कृताञ्जलयस्तदा<br>दिवि महामुनयः कृतनिश्चयाः।<br>शिवतरं शिवमेश्वरमव्ययं<br>मनसि लिङ्गमयं प्रणिपत्य ते॥ १<br>सकलदेवपतिर्भगवानजो<br>हरिरशेषपतिर्गुरुणा स्वयम्।<br>मुनिवराश्च गणाश्च सुरासुरा<br>नरवराः शिवलिङ्गमयाः पुनः॥ २<br>श्रुत्वैवं मुनयः सर्वे षट्कुलीयाः समाहिताः।<br>सन्त्यज्य सर्वं देवस्य प्रतिष्ठां कर्तुमुद्यताः॥ ३<br>अपृच्छन् सूतमनघं हर्षगद्गदया गिरा।<br>लिङ्गप्रतिष्ठां विपुलां सर्वे ते शंसितव्रताः॥ ४<br><br>सूत उवाच<br>प्रतिष्ठां लिङ्गमूर्तेर्वो यथावदनुपूर्वशः।<br>प्रवक्ष्यामि समासेन धर्मकामार्थमुक्तये॥ ५<br>कृत्वैव लिङ्गं विधिना भुवि लिङ्गेषु यत्नतः।<br>लिङ्गमेकतमं शैलं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम्॥ ६<br>हेमरत्नमयं वापि राजतं ताम्रजं तु वा।<br>सवेदिकं ससूत्रं च सम्यग्विस्तृतमस्तकम्॥ ७<br>विशोध्य स्थापयेद्भक्त्या सवेदिकमनुत्तमम्।<br>लिङ्गवेदी उमा देवी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः॥ ८ | सूतजी बोले—यह आकाशवाणी सुनकर दृढ़ संकल्पवाले उन मुनियोंने दोनों हाथ जोड़ लिये। परम कल्याणमय, लिङ्गमय तथा अविनाशी भगवान् शिवको मनमें प्रणाम करके सभी देवताओंके पति इन्द्र, ब्रह्मा, सबके स्वामी भगवान् विष्णु, देवगुरु बृहस्पतिसहित सभी श्रेष्ठ मुनि, सभी गण, देवता, असुर और श्रेष्ठ मनुष्य—इन सभीने अपनेको शिवलिङ्गमय अनुभव किया॥ १-२॥<br><br>यह सुनकर छहों कुलोंके सभी मुनि सब कुछ छोड़कर समाहितचित्त हो लिङ्गप्रतिष्ठा करनेके लिये उद्यत हुए। संयत व्रतवाले उन सभी मुनियोंने हर्षयुक्त गद्गद वाणीमें पुण्यात्मा सूतजीसे महती लिङ्गप्रतिष्ठाकी विधि पूछी॥ ३-४॥<br><br>सूतजी बोले—[हे मुनियो!] धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके लिये मैं आप लोगोंसे संक्षेपमें लिङ्गमूर्तिकी प्रतिष्ठाकी विधिका अनुक्रमसे यथावत् वर्णन करूँगा। पृथ्वीलोकमें कहे जानेवाले शैल आदि लिङ्गोंमें पाषाणका, हेमरत्नमय अथवा ताम्रका एक जलहरीसमेत और पंचसूत्र आदिसे युक्त तथा विस्तृत मस्तकवाला ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मक उत्तम लिङ्ग बनाकर उसे भलीभाँति शोधित करके वेदीसमेत भक्तिपूर्वक स्थापित करे। |