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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

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Page 760
७५८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| सर्वावरणनिर्मुक्तो ह्यचिन्त्यः स्वरसेन तु।<br>ज्ञेयमेतत्समाख्यातमग्राह्यमपि दैवतैः॥ १९<br><br>प्रविलीनो महान् सम्यक् स्वयंवैद्यः स्वसाक्षिकः।<br>चकास्त्यानन्दवपुषा तेन ज्ञेयमिदं मतम्॥ २०<br><br>परीक्षिताय शिष्याय ब्राह्मणायहिताग्नये।<br>धार्मिकायाकृतघ्नाय दातव्यं क्रमपूर्वकम्॥ २१<br><br>गुरुदैवतभक्ताय अन्यथा नैव दापयेत्।<br>निन्दितो व्याधितोऽल्पायुस्तथा चैव प्रजायते॥ २२<br><br>दातुरप्येवमनघे तस्माज्ज्ञात्वैव दापयेत्।<br>सर्वसङ्गविनिर्मुक्तो मद्भक्तो मत्परायणः॥ २३<br><br>साधको ज्ञानसंयुक्तः श्रौतस्मार्तविशारदः।<br>गुरुभक्तश्च पुण्यात्मा योग्यो योगरतः सदा॥ २४ | सर्वोत्कृष्ट, समस्त आवरणोंसे मुक्त और यथार्थतः अचिन्त्य है। उस ज्ञानको देवताओंके द्वारा भी अग्राह्य कहा गया है। यह परमात्मामें विलीन कर देनेवाला, महान्, स्वयंवैद्य तथा स्वयं अपना साक्षी है और आनन्दपूर्ण शरीरसे प्रकाशित होनेवाला है। यह अहंकाररहित पुरुषके द्वारा ही जाननेयोग्य है। [मेरे द्वारा उपदिष्ट] इस मत (ज्ञान)-को परीक्षा किये गये शिष्य, अग्निहोत्री ब्राह्मण, धर्मपरायण, कृतज्ञ और गुरु-देवताके प्रति भक्ति रखनेवाले व्यक्तिको ही प्रदान करना चाहिये; अन्यको कभी नहीं देना चाहिये। अनधिकारी व्यक्ति निन्दित, रोगसे पीड़ित तथा अल्प आयुवाला होता है और इसे प्रदान करनेवालेकी भी यही दशा होती है; हे अनघे! इसलिये पूर्णरूपसे परीक्षा करके ही इसे देना चाहिये। इसे प्राप्त करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण आसक्तियोंसे रहित, मेरा भक्त, मेरे प्रति परायण, साधक, ज्ञानवान्, श्रुति-स्मृतिसम्बन्धी कर्मोंका ज्ञान रखनेवाला, गुरुमें भक्ति रखनेवाला, पुण्यात्मा, योग्यतासम्पन्न तथा सर्वदा योगमें निरत रहनेवाला होता है॥ १७—२४॥ | | एवं देवि समाख्यातो योगमार्गः सनातनः।<br>सर्ववेदागमाम्भोजमकरन्दः सुमध्यमे॥ २५<br><br>पीत्वा योगामृतं योगी मुच्यते ब्रह्मवित्तमः।<br>एवं पाशुपतं योगं योगैश्वर्यमनुत्तमम्॥ २६<br><br>अत्याश्रममिदं ज्ञेयं मुक्तये केन लभ्यते।<br>तस्मादिष्टैः समाचारैः शिवार्चनरतैः प्रिये॥ २७<br><br>इत्युक्त्वा भगवान् देवीमनुज्ञाप्य वृषध्वजः।<br>शङ्कुकर्णं समासाद्य युयोजात्मानमात्मनि॥ २८ | हे देवि! हे सुमध्यमे! इस प्रकार यह योगमार्ग सनातन और समस्त वेद तथा आगमरूपी कमलका मकरन्द कहा गया है। इस योगरूपी अमृतका पान करके ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ योगी [भवबन्धनसे] मुक्ति प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार यह पाशुपतयोग समस्त योगोंका ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला तथा सर्वोत्कृष्ट है। इसे ब्रह्मचर्य आदि किसी आश्रमकी अपेक्षा न रखनेवाला जानना चाहिये। अतः हे प्रिये! यह सभी प्राणियोंके हितकी कामना करनेवाले शिवपूजापरायण लोगोंको किसी अनिर्वचनीय सौभाग्यसे ही मुक्तिके लिये प्राप्त होता है। ऐसा कहनेके पश्चात् वृषध्वज भगवान् शिव देवी पार्वतीसे आज्ञा लेकर और अपने गण शंकुकर्णको द्वारपर नियुक्त करके स्वयं समाधिमें लीन हो गये॥ २५—२८॥ | | शैलादिरुवाच<br>तस्मात्त्वमपि योगीन्द्र योगाभ्यासरतो भव।<br>स्वयम्भुव परा मूर्तिर्नूनं ब्रह्ममयी वरा॥ २९ | **शैलादि बोले—**अतएव हे योगीन्द्र! आप भी योगाभ्यासमें संलग्न हो जाइये। स्वयंभू शिवकी परामूर्ति |

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