श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
Page 784 of 834
Read in contextPage 784
| ७८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| देवैः सर्वैर्महाभागैः स्थापितानि शुभार्थिभिः। | हैं, जो मंगलकी कामनावाले सभी महाभाग्यशाली देवताओंके द्वारा स्थापित किये गये हैं॥ ३१-३२१/२॥ |
| पश्चिमे तु दिशाभागे रुद्रकुण्डस्य भामिनि॥ ३३<br><br>लिङ्गं तत्र स्थितं शुभ्रं देवाचार्य प्रतिष्ठितम्।<br>बृहस्पतीश्वरं नाम सर्वदुःखविनाशनम्॥ ३४ | हे भामिनि! वहाँ रुद्रकुण्डके पश्चिम दिशाभागमें एक शुभ्र लिङ्ग स्थित है, सभी दुःखोंका नाश करनेवाला बृहस्पतीश्वर नामक वह लिङ्ग देवताओंके आचार्य (बृहस्पति)-के द्वारा स्थापित किया गया है॥ ३३-३४॥ |
| पितृभिः स्थापितं लिङ्गं तटे कूपस्य दक्षिणे।<br>तेन पूजितमात्रेण पितरस्तृप्तिमाप्नुयुः॥ ३५ | कूपके दक्षिण तटपर पितरोंके द्वारा [एक] लिङ्ग स्थापित किया गया है, उसके पूजनमात्रसे पितर तृप्त हो जाते हैं॥ ३५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे गुह्यायतनवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणमें 'गुह्यायतनवर्णन' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६॥
सातवाँ अध्याय
कामेश्वर, भीष्मेश्वर, वालखिल्येश्वर, सनकेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, दधीचेश्वर तथा कालेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
|---|---|
| अन्यदायतनं श्रेष्ठं कालिपुर्य्यां सुरेश्वरि।<br>दक्षिणेन स्थितं देवं रुद्रवासस्य सुन्दरि॥ १<br><br>कामेश्वरमिति ख्यातं सर्वकामफलप्रदम्। | —हे सुरेश्वरि! हे सुन्दरि! कालिपुरीमें रुद्रवासके दक्षिणमें दूसरा श्रेष्ठ आयतन भी स्थित है, कामेश्वर नामसे विख्यात वह लिङ्ग सभी कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला है॥ १ १/२ ॥ |
| तप्तं तत्र तपस्तीव्रं कामदेवेन वै पुरा॥ २<br><br>कुण्डं तदुद्भवं देवि पद्मोत्पलसमन्वितम्।<br>कुण्डस्यैव तटे रम्ये उत्तमे वरवर्णिनि॥ ३<br><br>लिङ्गं तत्र स्थितं दिव्यं पश्चिमाभिमुखं प्रिये।<br>गन्धधूपनमस्कारैर्मुखवाद्यैश्च सर्वशः॥ ४<br><br>यो मामर्चयते तत्र तस्य तुष्याम्यहं सदा।<br>तुष्टे तु मयि देवेशि सर्वान् कामाँल्लभेत सः॥ ५ | पूर्वकालमें वहाँ कामदेवने घोर तपस्या की थी, इससे हे देवि! कमलोंसे युक्त एक कुण्ड वहाँ उत्पन्न हो गया। हे वरवर्णिनि! हे प्रिये! वहाँ कुण्डके ही रम्य तथा उत्तम तटपर पश्चिमकी ओर मुखवाला दिव्य लिङ्ग स्थित है। वहाँपर जो [व्यक्ति] गन्ध, धूप, नमस्कार तथा मुखवादनके द्वारा विधिवत् मेरा अर्चन करता है, उसके ऊपर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ, हे देवेशि! मेरे प्रसन्न हो जानेपर वह सभी इच्छित फलोंको प्राप्त कर लेता है॥ २—५॥ |
| ततः प्रभृति वै तस्मिन्नन्येऽपि सुरपुङ्गवाः।<br>आराधयन्तो मां तस्मिंस्तीर्थं वक्तुं महातपाः॥ ६ | उसी समयसे दूसरे श्रेष्ठ देवता भी उस लिङ्गमें मेरी आराधना करते हुए वहाँ निवास करते हैं, महान् तपस्वी भी उस तीर्थके माहात्म्यका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं॥ ६॥ |
| यस्य यस्य यदा कामस्तत्र तं तं ददाम्यहम्।<br>ददामि सर्वकामांश्च धर्मं मोक्षं तथैव च॥ ७ | जिस किसीकी भी जो कामना होती है, मैं उस कामनाको पूर्ण करता हूँ। मैं सभी कामनाओं, धर्म तथा मोक्षको प्रदान करता हूँ॥ ७॥ |