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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

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Page 803

अध्याय ९] व्याघ्रेश्वर, दण्डीश्वर, जैगीषव्येश्वर तथा शातातपेश्वर आदि लिङ्गोंका वर्णन [८०१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अस्याग्रे देवदेवेशि मुखलिङ्गं च तिष्ठति।<br>पश्चान्मुखं तु तं देवि पञ्चचूडा शुभेक्षणा॥ ६॥हे देवदेवेशि! इसके आगे मुखलिङ्ग विराजमान है। हे देवि! शुभ नेत्रोंवाली पंचचूड़ाने पश्चिमकी ओर मुखवाले उस लिङ्गको स्थापित किया है॥ ६॥
तस्य दक्षिणपार्श्वे तु नाम्ना प्रहसितेश्वरम्।<br>तं दृष्ट्वा लभते देवि आनन्दं ब्रह्मणः पदम्॥ ७॥उसके दक्षिण भागमें प्रहसितेश्वर नामक लिङ्ग है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य आनन्दप्रद ब्रह्मलोक प्राप्त करता है॥ ७॥
तस्योत्तरे तु देवेशि पुण्यं लिङ्गं त्वया कृतम्।<br>निवासेति च विख्यातं सर्वेषामेव योगिनाम्॥ ८॥<br>तेन दृष्टेन देवेशि योगं विन्दति शाङ्करम्।हे देवेशि! उसके उत्तरमें आपके द्वारा निवास नामसे विख्यात सभी योगियोंके लिये एक पुण्यप्रद लिङ्ग स्थापित किया गया है, हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य शांकरयोग प्राप्त करता है॥ ८ १/२॥
चतुःसमुद्रविख्यातः कूपस्तिष्ठति सुन्दरि॥ ९॥<br>चतुःसमुद्रस्नानेन यत्फलं लभते नरः।<br>तत्फलं सकलं तस्य उदकस्पर्शनाच्छुभे॥ १०॥हे सुन्दरि! वहाँ चतुःसमुद्र नामसे प्रसिद्ध एक कूप स्थित है। हे शुभे! मनुष्य चारों समुद्रोंमें स्नान करनेसे जो फल पाता है, वह सम्पूर्ण फल उस [चतुःसमुद्रकूप]-के जलके स्पर्श करनेसे उसे प्राप्त होता है॥ ९-१०॥
तत्रैव त्वं महादेवि रममाणा मया सह।<br>ये च त्वां पूजयिष्यन्ति भक्तियुक्ताश्च मानवाः॥ ११॥<br>न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥ १२॥हे महादेवि! आप वहींपर मेरे साथ विहार करती हैं। जो मनुष्य भक्तिसे युक्त होकर आपकी पूजा करेंगे, करोड़ों कल्पोंमें भी उनका पुनर्जन्म नहीं होगा॥ ११-१२॥
ईश्वर उवाच<br>कूपस्य उत्तरे देवि व्याघ्रेशस्य तु दक्षिणे।<br>तिष्ठते तत्र वै लिङ्गं पूर्वामुखं च सुन्दरि॥ १३॥<br>दण्डीश्वरमिति ख्यातं वरदं सर्वदेहिनाम्।<br>तेन दृष्टेन लभ्येत ऐश्वरं पदमव्ययम्॥ १४॥**ईश्वर बोले—**हे देवि! हे सुन्दरि! वहाँपर कूपके उत्तरमें तथा व्याघ्रेशके दक्षिणमें एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। वह दण्डीश्वर नामसे विख्यात है तथा सभी प्राणियोंको वर देनेवाला है, उसके दर्शनसे ईश्वरका शाश्वत पद प्राप्त होता है॥ १३-१४॥
तस्योत्तरे तडागं च देवि सर्वत्र विश्रुतम्।<br>सन्ध्याप्रणामकुपिता यदा तस्मिन् सुरेश्वरि॥ १५॥<br>बहुरूपं समास्थाय देवदेवः स्वयं हरः।<br>दण्डकश्च तदा क्षिप्तो देवाग्रे स प्रभाकरः॥ १६॥<br>तेन तत्र कृतं दिव्यं तडागं लोकविश्रुतम्।<br>क्रोधेन प्रस्थिता देवि तुहिनाचलसम्मुखम्॥ १७॥<br>तावदस्य तदग्रे वै तडागं महदद्भुतम्।<br>तं दृष्ट्वा तु तदा देवि निवृत्ता पुनरेव वा॥ १८॥हे देवि! उसके उत्तरमें सर्वत्र प्रसिद्ध एक तडाग है। हे सुरेश्वरि! सन्ध्याकालमें प्रणाम न करनेके कारण जब तुम कुपित हुई, तब देवाधिदेवने स्वयं अनेक रूप धारण करके देवताओंके सम्मुख ज्योतिर्मय दण्डको फेंका, उसने वहाँ लोकप्रसिद्ध तडाग बना दिया। हे देवि! जब तुमने क्रोधपूर्वक हिमालयके सम्मुख प्रस्थान किया, उसी समय उसके आगे अत्यन्त अद्भुत तडाग मिला। हे देवि! उसे देखकर तुम पुनः वापस आ गयी और हे देवेशि! हे भामिनि! उसके बाद घरमें प्रवेश करके वहींपर स्थित हो गयी। देवाधिदेवके दण्डके वहाँ गिरनेपर महान् सरोवर हो गया। अतः जो पुराणवेत्ता
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