श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
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| ८०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
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| लेता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ १७ ॥ | |
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| तेन ते नाम विख्यातं तथा मुखनिरीक्षिणी।<br>मुखप्रेक्षणिकां दृष्ट्वा सौभाग्यं चोत्तमं लभेत् ॥ १८ | अतः आपका नाम मुखनिरीक्षिणी विख्यात हो गया, मुखप्रेक्षणीका दर्शन करके मनुष्य उत्तम सौभाग्य प्राप्त करता है ॥ १८ ॥ |
| माघे मासि चतुर्थ्यां तु तस्मिन् काल उपोषितः।<br>अर्चयित्वा तु यो देवि जागरं तत्र कारयेत् ॥ १९<br><br>तस्यर्द्धिमत् कुलं देवि त्रैलोक्ये याति दुर्लभम्। | हे देवि! माघमासमें चतुर्थी तिथिमें उस समय उपवास करके तथा पूजन करके जो वहाँपर जागरण करता है, हे देवि! वह तीनों लोकोंमें समृद्धिशाली तथा दुर्लभ कुलमें जन्म लेता है ॥ १९१/२ ॥ |
| मुखप्रेक्षा चोत्तरतो द्वौ लिङ्गौ तत्र विश्रुतौ ॥ २०<br><br>पश्चान्मुखौ तु तौ देवि वृत्रत्वाष्ट्रेश्वरावुभौ।<br>काञ्चनीं पृथिवीं दत्त्वा यत्पुण्यं लभते नरः ॥ २१<br><br>सुवर्णस्य च यत्पुण्यं लिङ्गयोर्दर्शनेन तत्।<br>त्रिरात्रं यः प्रकुरुते तत्रैव वरवर्णिनि ॥ २२<br><br>गौरीलोकोऽक्षयस्तस्य पुनरावृत्तिदुर्लभः।<br>तस्माद्यत्नः सदा कार्यः सर्वदर्शनकाङ्क्षया ॥ २३ | मुखप्रेक्षाके उत्तरदिशामें दो प्रसिद्ध लिङ्ग हैं, हे देवि! पश्चिमकी ओर मुखवाले वे दोनों लिङ्ग वृत्रेश्वर तथा त्वाष्ट्रेश्वर नामवाले हैं। सुवर्णमयी भूमिका दान करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है और सुवर्णके दानका जो पुण्य होता है, वह पुण्यफल उन दोनोंके दर्शनसे प्राप्त कर लेता है। हे वरवर्णिनि! जो वहाँपर तीन रात व्यतीत करता है, उसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति न करानेवाले अक्षय गौरीलोककी प्राप्ति होती है। इसलिये इन सबके दर्शनकी अभिलाषाके लिये सदा प्रयत्न करना चाहिये ॥ २०–२३ ॥ |
| ललितायाश्चोत्तरेण चर्चिकाधिष्ठिता शुभा।<br>मानवानां हितार्थाय वरदा सर्वदेहिनाम् ॥ २४<br><br>चर्चिकायास्तथैवाग्रे तिष्ठते लिङ्गमुत्तमम्।<br>पूर्वामुखं तु तद्देवि रेवन्तेन प्रतिष्ठितम् ॥ २५ | ललिताके उत्तरमें मनुष्योंके कल्याणके लिये सभी प्राणियोंको वर देनेवाली शुभ चर्चिका [देवी] विराजमान हैं। इसी प्रकार चर्चिकाके आगे एक उत्तम लिङ्ग स्थित है, हे देवि! पूर्वकी ओर मुखवाला वह [लिङ्ग] रेवन्तके द्वारा स्थापित किया गया है ॥ २४-२५ ॥ |
| तस्याग्रतो वरारोहे लिङ्गं पञ्चनदीश्वरम्।<br>पश्चान्मुखं तु तद्देवि सर्वस्नानफलप्रदम् ॥ २६ | हे वरारोहे! उसके आगे पंचनदीश्वर नामक लिङ्ग है। हे देवि! पश्चिमकी ओर मुखवाला वह [लिङ्ग] समस्त स्नानोंका फल प्रदान करनेवाला है ॥ २६ ॥ |
| ललितायाश्च संलग्नं पूर्वे कूपस्तु तिष्ठति।<br>तस्मिन् कूपे जलं स्पृष्ट्वा अतिरात्रफलं लभेत् ॥ २७ | ललिताके समीपमें पूर्वकी ओर एक कूप स्थित है, उस कूपके जलका स्पर्श करके मनुष्य अतिरात्रयज्ञका फल प्राप्त करता है ॥ २७ ॥ |
| ततो दक्षिणतो देवि तीर्थं पञ्चनदं स्मृतम्।<br>नरः पञ्चनदे स्नात्वा दृष्ट्वा लिङ्गं गभस्तिनः ॥ २८<br><br>अनन्तं फलमाप्नोति यत्र तत्राभिजायते। | हे देवि! उसके दक्षिणमें पंचनद [नामक] तीर्थ बताया गया है, [उस] पंचनदमें स्नान करके तथा गभस्तीश्वरका दर्शन करके मनुष्य जहाँ-कहीं भी हो, अनन्त फल प्राप्त करता है ॥ २८१/२ ॥ |
| उपमन्युश्च सुश्रोणि लिङ्गं स्थापितवांस्तथा ॥ २९<br><br>मुखानि तस्य तिष्ठन्ति तस्मिँल्लिङ्गे यशस्विनि।<br>तच्च पश्चान्मुखं देवि ललितादक्षिणेन तु ॥ ३० | हे सुश्रोणि! उपमन्युने एक लिङ्ग स्थापित किया है, हे यशस्विनि! उस लिङ्गमें उसके मुख स्थित हैं। हे देवि! पश्चिमाभिमुख वह लिङ्ग ललिताके दक्षिणमें |