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श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished833 pages

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८१८श्रीलिङ्गमहापुराण[ परिशिष्ट
पापात्मा मनुष्योंके द्वारा अप्राप्य है॥ १६॥
यैस्तु तत्र जलं पीतं कृतार्थास्ते तु मानवाः।<br>तेषां तु तारकं ज्ञानमुत्पत्स्यति न संशयः॥ १७जिन्होंने उस जलका पान कर लिया, वे मनुष्य धन्य हैं और उनमें तारक ज्ञान उत्पन्न हो जाता है, इसमें संशय नहीं है॥ १७॥
वापीजले नरः स्नात्वा दृष्ट्वा वै दण्डनामकम्।<br>अविमुक्तं ततो दृष्ट्वा कैवल्यं लभते क्षणात्॥ १८उस वापीके जलमें स्नान करके दण्ड-पाणिका दर्शनकर और इसके बाद अविमुक्त [लिङ्ग]-का दर्शन करके मनुष्य क्षणभरमें कैवल्य प्राप्त करता है॥ १८॥
अविमुक्तस्य चाग्रे तु लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>प्रीतिकेश्वरनामानं प्रीतिं यच्छति शाश्वतीम्॥ १९<br><br>अविमुक्तोत्तरेणैव लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्।<br>अविमुक्तं च तं देवि नाम्ना वै मोक्षकेश्वरम्॥ २०अविमुक्तके आगे प्रीतिकेश्वर नामक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, वह शाश्वत प्रीति प्रदान करता है। अविमुक्तके उत्तरमें ही एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे देवि! वह भी अविमुक्त है तथा मोक्षकेश्वर नामसे प्रसिद्ध है॥ १९-२०॥
तेन दृष्टेन देवेशि ज्ञानवान् जायते नरः।<br>तस्य चोत्तरतो देवि लिङ्गं चैव चतुर्मुखम्॥ २१हे देवेशि! उसके दर्शनसे मनुष्य ज्ञानी हो जाता है। हे देवि! उसके उत्तरमें पापियोंके भयका नाश करनेवाला वरुणेश्वर नामक चतुर्मुख लिङ्ग विद्यमान है॥ २१ १/२॥
वरुणेश्वरनामानं पापानां भयमोचनम्।<br>पूर्वेण तस्य संलग्नं मुखलिङ्गं च तिष्ठति॥ २२<br><br>सुवर्णाक्षेश्वरं नाम यज्ञानां फलदायकम्।<br>तस्य चैवोत्तरे गौरी स्वयं तिष्ठति पुण्यदा॥ २३उसके पूर्वमें समीपमें ही यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाला सुवर्णाक्षेश्वर नामक मुखलिङ्ग स्थित है। उसीके उत्तरमें पुण्यदायिनी स्वयं गौरी स्थित हैं, उन देवीके दर्शनसे परम सौभाग्य प्राप्त होता है॥ २२-२३ १/२॥
तस्यास्तु दर्शनाद्देव्याः सौभाग्यं जायते परम्।<br>दक्षिणे तस्य देवस्य निकुम्भो नाम वै गणः॥ २४<br><br>तं दृष्ट्वा मानुषो देवि क्षेत्रवासं तु विन्दति।<br>विनायकश्च तत्रैव पश्चिमेन यशस्विनि॥ २५<br><br>तस्य दर्शनमात्रेण विघ्नैर्नैवाभिभूयते।<br>निकुम्भस्य तु पूर्वेण लिङ्गं पश्चान्मुखं स्थितम्॥ २६उस [सुवर्णाक्षेश्वर] देवके दक्षिणमें निकुम्भ नामक गण विद्यमान है, हे देवि! उसका दर्शन करके मनुष्य क्षेत्रवास प्राप्त करता है। हे यशस्विनि! वहींपर पश्चिममें विनायक स्थित हैं, उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य विघ्नोंसे बाधित नहीं होता है॥ २४-२५ १/२॥
मुखलिङ्गं तु तं देवि विजयाख्यं स्वयं प्रिये।<br>दक्षिणेन तु तत्रैव शुक्लेश्वरमिति स्मृतम्॥ २७<br><br>मुखलिङ्गं तु तं भद्रे शुक्रेण स्थापितं पुरा।<br>पूर्वामुखं तु तं भद्रे शिवलोकप्रदायकम्॥ २८निकुम्भके पूर्वमें एक पश्चिमाभिमुख लिङ्ग स्थित है, हे देवि! हे प्रिये! वह साक्षात् विजय नामक मुखलिङ्ग है। वहींपर दक्षिणमें शुक्लेश्वर नामक मुखलिङ्ग बताया गया है, हे भद्रे! शुक्राचार्यने उसे पूर्वकालमें स्थापित किया था। हे भद्रे! वह पूर्वाभिमुख है तथा शिवलोक प्रदान करनेवाला है॥ २६-२८॥
तस्यैव चोत्तरे देवि मुखलिङ्गं च तिष्ठति।<br>पश्चान्मुखं तु तं देवि देवयान्या तु स्थापितम्॥ २९हे देवि! उसीके उत्तरमें पश्चिमकी ओर मुखवाला एक मुखलिङ्ग स्थित है, हे देवि! वह देवयानीके द्वारा स्थापित किया गया है॥ २९॥