श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
Page 826 of 834
Read in context| ८२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ परिशिष्ट |
|---|
| पश्चान्मुखं तु तल्लिङ्गं सर्वसिद्धिप्रदायकम्।<br>अन्यदायतनं देवि पश्चिमेन यशस्विनि॥ २२<br>कपर्दीश्वरनामानमुत्तमं सर्वदायकम्। | स्थित है। वह सभी सिद्धियाँ देनेवाला है। हे देवि! उसके पश्चिममें अन्य आयतन स्थित है। हे यशस्विनि! कपर्दीश्वर नामक वह उत्तम आयतन (लिङ्ग) सब कुछ प्रदान करनेवाला है॥ २०-२२ १/२॥ | | तस्य पूर्वेण सुश्रोणि लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम्॥ २३<br>हरितेश्वरनामानं सर्वपापक्षयङ्करम्।<br>कात्यायनेश्वरं नाम तस्य दक्षिणतः स्थितम्।<br>तेन दृष्टेन मनुजः सर्वयज्ञफलं लभेत्॥ २४ | हे सुश्रोणि! उसके पूर्वमें सभी पापोंका नाश करनेवाला हरितेश्वर नामक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। उसके दक्षिणमें कात्यायनेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, उसके दर्शनसे मनुष्य समस्त यज्ञोंका फल प्राप्त करता है॥ २३-२४॥ | | अन्यत्तस्यैव पार्श्वे तु अङ्गारेस्वरसंज्ञितम्।<br>तडागं चापि तत्रस्थमङ्गारेस्वरसंज्ञितम्॥ २५ | उसीके पासमें अंगारेश्वर नामक अन्य लिङ्ग विद्यमान है और वहींपर अंगारेश्वर नामक तडाग भी स्थित है॥ २५॥ | | तस्य दक्षिणदिग्भागे नातिदूरे व्यवस्थितम्।<br>मुकुरेश्वरनामानं सर्वयात्राफलप्रदम्॥ २६<br>पश्चिमाभिमुखं लिङ्गं कुण्डस्य पुरतः स्थितम्।<br>तस्य कुण्डस्य पार्श्वे तु छागलेश्वरसंज्ञितम्॥ २७<br>तस्य दर्शनमात्रेण योगैश्वर्यं प्रवर्तते।<br>अन्यानि सन्ति लिङ्गानि शतशोऽथ सहस्रशः॥ २८<br>न मया तानि चोक्तानि बहुत्वान्नामधेयतः।<br>सप्तकोट्यस्तु लिङ्गानि अस्मिन् स्थाने स्थिता भुवि॥ २९<br>तेषां दर्शनमात्रेण ज्ञानं चोत्पद्यते क्षणात्। | उसके दक्षिण दिशाभागमें समीपमें ही सभी यात्राओंका फल प्रदान करनेवाला मुकुरेश्वर नामक लिङ्ग स्थित है। पश्चिमाभिमुख वह लिङ्ग कुण्डके सामने स्थित है। उस कुण्डके पासमें छागलेश्वर नामक लिङ्ग विद्यमान है, उसके दर्शनमात्रसे योगैश्वर्य प्राप्त होता है। वहाँपर अन्य सैकड़ों-हजारों लिङ्ग स्थित हैं, बहुत-से होनेके कारण नाम लेकर मैंने उन्हें नहीं बताया। पृथिवीपर इस स्थानमें सात करोड़ लिङ्ग हैं, उनके दर्शनमात्रसे क्षणभरमें ज्ञान उत्पन्न हो जाता है॥ २६-२९ १/२॥ | | उद्देशमात्रं कथितं मया तुभ्यं वरानने॥ ३०<br>न शक्यं विस्तराद्वक्तुं वर्षकोटिशतैरपि।<br>एतानि सिद्धलिङ्गानि कूपाः पुण्या हृदास्तथा॥ ३१<br>वाप्यो नद्योऽथ कुण्डानि मया ते परिकीर्तिताः।<br>एतेषु चैव यः स्नानं करिष्यति समाहितः॥ ३२<br>लिङ्गानि स्पर्शयित्वा च संसारे न विशेत् पुनः। | हे वरानने! मैंने संक्षेपमें आपको बताया है, सौ करोड़ वर्षोंमें भी विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं किया जा सकता है। मैंने आपसे इन सिद्धलिङ्गों, कूपों, पवित्र हदों, वापियों, नदियों तथा कुण्डोंका वर्णन कर दिया। जो एकाग्रचित्त होकर इन [कुण्ड आदि]-में स्नान करता है तथा लिङ्गोंका स्पर्श करता है, वह संसारमें पुनः प्रवेश नहीं करता है॥ ३०-३२ १/२॥ | | पृथिव्यां यानि तीर्थानि अन्तरिक्षचराणि च॥ ३३<br>तेषां मध्ये तु ये श्रेष्ठा मया ते कथिता शुभे।<br>तीर्थयात्रा वरारोहे कथिता पापनाशिनी॥ ३४<br>येन चैषा कृता देवि सोऽवश्यं मुक्तिभाग्भवेत्॥ ३५ | हे शुभे! पृथिवीपर तथा अन्तरिक्षमें जो तीर्थ हैं, उनमें जो श्रेष्ठ हैं, उनका वर्णन मैंने कर दिया। हे वरारोहे! मैंने पापोंका नाश करनेवाली तीर्थयात्राको भी बता दिया, हे देवि! जिसने इसे कर लिया, वह अवश्य ही मुक्तिका भागी होता है॥ ३३-३५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे वाराणसीमाहात्म्ये गुहायतनवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत वाराणसी-माहात्म्यमें 'गुहायतनवर्णन' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४॥