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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

by महाकवि नरोत्तमदास

DevanagariHindipublished108 pages

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४२ / सुदामा-चरित अंतरजामी वे आपुहि जानिहैं, मानौ यहै सिख लेहु हमारी । द्वारिकानाथ के द्वार गए सबतें पहिले सुधि लैहैं तुम्हारी ॥१७॥ सुदामा दीनदयाल को ऐसोई द्वार है, दीनन की सुधि लेति सदाई । द्रौपदी तें, गज तें, प्रह्लाद तें, जानि परा न विलंब लगाई ॥ याहि तें भावत मो-मन दीनता, जौ निबहैं निबही जस आई । जौ ब्रजराज सों प्रीति नहीं, केहि काज सुरेसहु की ठकुराई ॥१८॥ (कवित्त) स्त्री फाटे पट टूटी छानि खायौ भीख माँगि आनि, बिना जग्य बिमुख रहत देव-पित्रई । वै हैं दीनबन्धु दुखी देखिकै दयालु ह्वैहैं, दैहैं कछु भलो, सो हौं जानत अगत्रई ॥ द्वारिका लौं जात पिय ! केतौ अलसात तुम, काहे कौ लजात, भई कौन-सी विचित्रई । जौ पै सब जन्म या दरिद्र ही सतायौ तौ पे, कौन काज आइहैं कृपानिधि की मित्रई ॥१६॥ सुदामा तैं तो कही नीकी सुनि बात हित-ही की, यही रीति मित्रई की नित प्रीति सरसाइए । मित्र के तें चित्त चाहिए परस्पर, मित्र के जो जेंइए तो आपहू जेंवाइए ॥ वै हैं महाराज जोरि बैठत समाज भूप, तहाँ यदि रूप जाइ कहा सकुचाइए ।