सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
by महाकवि नरोत्तमदास
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Read in context४८ / सुदामा-चरित कहै नरोत्तम; रिद्धि सिद्धिन मैं सोर भयौ, ठाढ़ी थरहरैं ओर सोचै कमला तहीं ॥ नाक लोक, नाग लोक, ओक-ओक थोत-थोक, ठाढ़े थरहरैं मुख सूखे सब गातहीं । हालो परो थोकन मैं, लालो परो लोकन मैं, चालो परो चक्रन मैं चाउर चबातही ! ॥५२॥ (सवैया) भौन भरो पकवान मिठाइन, लोग कहैं निधि हैं सुषमा के । सांझ सबेरे पिता अभिलाषत, दाख न चाखत सिंधु छमा के । बाँभन एक कोउ दुखिया सेर पावक चाउर लायौ समा के ॥ प्रीति की रीति कहा कहिए, तेहि बैठि चबात हैं कंत रमा के ॥५३॥ (दोहा) मुठी तीसरी भरत ही, रुकुमिनि पकरी बाँह । 'ऐसो तुम्हें कहा भई, संपति की अनचाह' ॥५४॥ कही रुकुमिनी कान में, 'यह धौं कौन मिलाप । करत सुदामा आप सों, होत सुदामा आप' ॥५५॥ (दोहा) यह कौतुक लखिकै सभय, कही सेवकिनि आय । भई रसोई सिद्ध प्रभु ! 'भोजन करिए जाय' ॥५६॥ बिप्र-सहित असनान करि, धोती पहिरि बनाय । संध्या करि मध्याह्न की, चौका बैठे जाय ॥५७॥ (कवित्त) रूपे के रुचिकर-थार पायक सहित सिता— जीती जिन सोभा है सरदहू के चन्द की ।