सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
by महाकवि नरोत्तमदास
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(१) शब्दार्थ — गनेश = गणेश (हिन्दुओं के एक प्रसिद्ध देवता, जिन्हें सिद्धि के देवता का सम्मान प्राप्त है।)। सुमिरन – स्मरण, स्तुति, प्रार्थना । वरनन = वर्णन । जासो दारिद नास = जिनके नामस्मरण से निर्धनता का नाश होता है । व्याख्या – कविवर नरोत्तमदास अपने काव्य का प्रारम्भ करने से पहले श्री गणेश जी का स्मरण करते हैं, जिससे उनके हृदय में निर्मल बुद्धि उत्पन्न हो । उसके उपरांत वे श्रीकृष्ण और सुदामा के चरित्र का वर्णन करते हैं, जिससे भक्तों के दारिद्र्य रूपी दुःख का विनाश हो जाता है और उन्हें सुख-शांति प्राप्त होती है । विशेष—इस दोहे को हम इस रचना का मंगलाचरण मान सकते हैं । इस दृष्टि से कवि ने प्रबन्ध-काव्य की प्राचीन परम्परा का पालन किया । (२) शब्दार्थ—तें = मे । निरवान = स्वर्ग, मोक्ष । सिंधुर-मुख—हाथी के समान मुख वाले, गणेश देवता । मूढ़ = मूर्ख । व्याख्या—गंगा-जल के पान से जैसे पापी मनुष्य को भी मुक्ति मिल जाती है वैसे ही हाथी के समान मुख वाले गणेश देवता की कृपा से मूर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान बन जाता है । विशेष—इस दोहे में गणेश देवता की स्तुति की गई है, उन्हें बुद्धि-दाता का सम्मान दिया गया है । (३) शब्दार्थ—कई = कितने ही । वरनन = वर्णन । माया = लक्ष्मी, संसा- रिक वैभव । ताको = उनको । सु = सुन्दर । व्याख्या—श्रीकृष्ण और सुदामा जन्म-जन्मान्तरों से मित्र रहे हैं । इस