सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
by सन्त सुन्दरदास जी
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॥ मन को अंग ॥ [ ७७ ॥ अथ मन को अंग ॥११॥ मनहर छंद हटकि हटकि मन राखत जु छिन छिन, सटकि सटकि चहु ओर अब जात है । लटकि लटकि ललचाइ लोल बार बार, गटकि गटकि करि बिष फल खात है ॥ झटकि झटकि तार तोरत करम हीन, भटकि भटकि कहु नैकु न अघात है । पटकि पटकि सिर सुन्दर जु मानी हारि, फटकि फटकि जाइ सुधौ कौन बात है ॥१॥ पल ही मैं मरि जात पल ही मैं जीवत है, पल ही मैं परहाथ देखत बिकानौ है । पल ही मैं फिरै नवखंडहु ब्रह्माण्ड सब, देख्यौ अनदेख्यौ सु तौ या ते नहि छानौ है ॥ जातौ नहि जानियत आवतौ न दीसै कछु, ऐसी सी बलाइ अब तासौं पर्यौ पानौ है । सुन्दर कहत याकी गति नही जानी परै, मन की प्रतीति कोऊ करै सु दिवानौ है ॥२॥ (१) हटकि-हठ करके । सटकि-झट से सरक कर । लटकि-उछलकर । लोल-चंचल । झटकि-झटका देकर । तार-भगवान मे ध्यान का तार । (२) बलाइ-आफत ।