उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
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Read in contextस्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ९१ दृशीति-आत्मा, सम्पूर्ण देहधारियों के अन्तःकरणों को आकाश के समान व्याप्त करके साक्षी के रूप में स्थित है। अतः उससे भिन्न अन्य कोई ज्ञाता नहीं है, और न उससे भिन्न परमेश्वर ही ज्ञाता है। इसलिये आत्मा एक ही है ॥ ४४ ॥ हृदयस्पर्शिनी बुद्धि और उसकी वृत्तियों का साक्षी (द्रष्टा) होने के कारण आत्मा का नित्यमुक्तत्व (बन्धनशून्यत्व = असितत्व) यद्यपि सिद्ध किया गया है, अर्थात् द्विविध देहों से आत्मा का पृथक्त्व (विविक्तत्व) यद्यपि बताया गया है, तथापि प्रत्येक देह में उसकी भेदेन प्रतीति होती है, अर्थात् प्रत्येक देह में वह परिच्छिन्न हुआ प्रतीत होता है। उस- कारण ब्रह्मरूप में उसकी पूर्णता कैसे हो सकती है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है—यह आत्मा सम्पूर्ण देहधारियों के अन्तःकरणों को उनका साक्षी (द्रष्टा) बनकर, घट-पटादिकों को व्याप्त किये हुए आकाश के समान व्याप्त करके अवस्थित है। वह परिच्छिन्न रूप में स्थित नहीं है। अतः उस चिति (चैतन्य) स्वरूप आत्मा से भिन्न कोई अन्य जीव ज्ञाता नहीं है, तथा न उससे भिन्न कोई दूसरा ईश्वर ही ज्ञाता है। क्योंकि दोनों का चैतन्य (चिति) स्वरूप एक (समान) ही है। अतः एक ही आत्मा है। उसके भिन्न-भिन्न स्वरूप नहीं हैं। आकाश के समान उपाधि- परामर्श के बिना उसमें भेदप्रतीति नहीं हो पाती। अतः वास्तविक रूप से आत्मा एक ही है ! उसकी भिन्नता में कोई प्रमाण नहीं है। इससे आत्मा की ब्रह्मात्मता (ब्रह्मरूपता = पूर्णता) सिद्ध है ॥ ४४ ॥ शरीरबुद्धयोर्यदि चान्यदृश्यता निरात्मवादाः सुनिराकृता मया । परश्च शुद्धो ह्यविशुद्धिकर्मतः सुनिर्मलः सर्वगतोऽसितोऽद्वयः ॥४५॥ शरीरबुद्धयोरिति - शरीर और बुद्धि की परप्रकाश्यता यदि सिद्ध होती है, तो मैंने शून्यवादादि निरात्म- वादों का सम्यकतया निराकरण कर दिया है। उसी तरह हिंसादि दोषों से दूषित कर्मों का साक्षी जो आत्मा है, वह भी उन कर्मों से भिन्न है, वह शुद्ध, निर्मल, सर्वगत, स्वतन्त्र एवं अद्वितीय है ॥ ४५ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वकथनानुसार यह आत्मा यदि स्थूल-सूक्ष्म दोनों देहों का साक्षी और ब्रह्मरूप है, तो कुछ लोगों को उसके न होने की (उसकी सत्ता = विद्यमानता = अस्तित्व में) शंका क्यों होती है ? यह प्रश्न अभी दूर नहीं हो रहा है। इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर एक शब्द में यही होगा कि 'अपने ही दोष के कारण'—स्वदोषवशादेव वैसी शंका होती है। पूर्वोक्त न्याय से स्थूल-सूक्ष्म देह (शरीर-बुद्धि) की दृश्यता, नित्य-सद्रूप किसी अन्य के द्वारा (शरीर-बुद्धि की परप्रकाश्यता) जबकि सिद्ध हो चुकी है, तब उस से शून्य-क्षणिकवादी (निरात्मवादी) का निराकरण पूर्णरूप से हो जाता है। अर्थात् श्रुति-प्रमाण तथा प्रत्यभिज्ञा प्रमाण के बल पर बौद्धादिकों के सिद्धान्त का निराकरण अच्छी तरह से कर दिया गया है। साक्षी के रूप में वह आत्मा, संसार के हेतुभूत (कारणीभूत) अविशुद्धिकर धर्माऽधर्माख्य कर्मों से एकदम पृथक् (व्यतिरिक्त) ही है, क्योंकि वह तो उनका साक्षीमात्र है। अतः वह साक्षी अद्वय आत्मा अकर्ता (शुद्ध), और कर्मफल-भोगफल के लेश से भी रहित ( सुनिर्मल ), तथा अपरिच्छिन्न (सर्वगत), अतएव बन्धनशून्य (असितः = षिञ् बन्धने) है। उसी तरह वह अद्वितीय भी है। द्वैत प्रपञ्च तो दृश्य है, अतः यह आत्मा तत्सम्बन्धरहित सिद्ध होता हैं ॥ ४५ ॥ घटादिरूपं यदि तेन गृह्यते मनः प्रवृत्तं बहुधा स्ववृत्तिभिः । अशुद्धयचिद्रूपविकारदोषता मतेर्यथा वारयितुं न पार्यते ॥४६॥ घटादिरूपमिति—पुनः एक जिज्ञासा होती है कि आत्मा यदि 'मन' का ग्रहण करता है, और वह मन अपनी वृत्तियों से अनेक आकारों में परिणत होता है। तब उस परिणत हुए मन का ग्रहण करनेवाले आत्मा में भी उस परिणत हुए मन के समान विषयसंसर्गजनित अशुद्धि, अचित्स्वरूपता, और विकारिता आदि दोष उत्पन्न होंगे। जिनका निवारण करना संभव नहीं है ॥ ४६ ॥