उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
Page 120 of 364
Read in context९४ उपदेशसाहस्री प्रतिभास होता है, वह भी 'आत्मा' से पृथक् ही है। वे 'आत्मा' के विशेषण नहीं हैं। अतः दृश्य होने मात्र से वे शुक्ति- रजत के समान मिथ्या हैं ॥ ४९ ॥ हृदयस्पर्शिनी भगवती श्रुति ने स्थूल-सूक्ष्म प्रपञ्च का बाध कर दिया है यह बताकर, युक्ति से भी उसका बाध बता रहे हैं। जिस प्रकार विषय के सम्बन्ध से उत्पन्न हुई मन की विषयाकार वृत्तिरूपा जाग्रत् अवस्था है, उसी प्रकार स्वप्न और स्मृति के समय (विषय का अभाव रहने पर भी) मन की वृत्ति विषयाकार हुई-सी दिखाई देती है। वे मनो- वृत्तियाँ आत्मा के द्वारा दृश्य रहती हैं, उस कारण उन्हें आत्मा से पृथक् ही समझना चाहिये। वे आत्मा की विशेषण नहीं हैं। तथैव दृश्य होने के कारण ही शरीर, मन एवं देहद्वय का प्रतिभास भी आत्मा से पृथक् ही है। अर्थाकार (विषयाकार) हुआ जो रूप है, वह मन का रूप है, आत्मा का नहीं। आत्मातिरिक्त स्थूल-सूक्ष्मादि यच्चयावत् पदार्थ, आत्मा के द्वारा दृश्य होने के कारण उससे पृथक् ही हैं। और दृश्य होने से शुक्तिरजतादि के समान वे सभी मिथ्या हैं ॥ ४९ ॥ स्वभावशुद्धे गगने घनादिके मलेऽपयाते सति चाविशेषता । यथा च तद्वच्छ्रुतिवारितद्वये सदाऽविशेषो गगनोपमे दृशौ ॥५०॥ स्वभावशुद्धे इति—जैसे स्वभावतः ही शुद्ध आकाश में मेघादि मल के निवृत्त हो जाने पर कोई विशेषता नहीं रहती, वैसे ही भगवती श्रुति के द्वारा द्वैतमल का निराकरण कर देने पर उस आकाशसदृश साक्षी में सर्वदा ही विशेषता का अभाव रहता है ॥ ५० ॥ हृदयस्पर्शिनी भगवती श्रुति के द्वारा यदि आत्मा में अध्यस्त संसार का निरसन (निषेध) कर आत्मा का प्रतिपादन किया जा रहा है, तो निवृत्त संसारी और अनिवृत्त संसारी में कोई भेद ही नहीं रहा, दोनों समान हैं, तब उसमें अनित्यत्वादि दोषों की प्रसक्ति क्यों नहीं होगी ? अथवा प्रकारान्तर से यह भी कह सकते हैं कि अध्यस्त का निषेध करने से आत्मा में निवृत्त-संसारत्वरूपविशेषतारूपी विकार पैदा होने के कारण उसमें अनित्यत्वादि दोष का प्रसंग क्यों नहीं होगा ? उक्त शंका का समाधान यह है कि जिस प्रकार स्वभावतः शुद्ध आकाश में मेघादि मल की निवृत्ति हो जानेपर कोई विशेषता (विकार) नहीं रहती, अर्थात् आकाश (गगन) रूप अधिष्ठान सदैव विकाररहित (अविक्रिय) ही है। उसी प्रकार श्रुति के द्वारा जिसमें द्वैत का निषेध किया गया है, उस आकाशसदृश साक्षी में सर्वदा ही विशेषता का अभाव है। अर्थात् उसमें कूटस्थता है। यह दृक् आत्मा, स्वभावत एव शुद्ध है, उसके स्वरूप में अध्यस्तनिवृत्ति के व्यतिरिक्त कभी कोई विशेष नहीं होता। और यह निवृत्ति, मिथ्याप्रतियोगिक होने से (मिथ्या पदार्थ की निवृत्ति होने से) अधिष्ठानरूप दृगात्मा के व्यतिरिक्त (भिन्न) नहीं है। अतः आत्मस्वरूप में कभी कोई किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ करता। उसका अपना विशुद्ध स्वरूप ही आच्छादन के हट जाने पर प्रकट रहता है ॥ ५० ॥ ॥ इति चतुर्दशं स्वप्नस्मृतिप्रकरणं समाप्तम् ॥