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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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१०० उपदेशसाहस्री स्नायुरहित, शुद्ध, पापशून्य है। ब्राह्मण¹ ने भी इसी का समर्थन किया है। इस शास्त्र के अनुसार प्रकाशस्वभाव (शुक्रमू=दीप्तिमत्) शुद्ध आत्मस्वरूप माना गया है, उस आत्मस्वरूप का चिन्तन करे ॥ ९ ॥ व्रणस्नावोरभावेन स्थूलं देहं निवारयेत् । शुद्धापापत्तयाऽलेपं लिङ्गं चाकायमित्युत ॥१०॥ व्रणेति—पूर्वोक्त 'स पर्यगात्' इत्यादि श्रुति ने व्रण और स्नायु का अभाव बताकर स्थूल शरीर का निराकरण किया है। शुद्ध और निष्पाप बताकर उसे ( आत्मा को ) निर्लेप बताया है, तथा अकाय कहकर सूक्ष्म शरीर का निषेध किया है ॥ १०॥ हृदयस्पर्शिनी अब दशम श्लोक के द्वारा श्रुतिगत 'अव्रणम्, अस्नाविरम्' पदों के अर्थ को बता रहे हैं। श्रुति ने व्रण (क्षत) और स्नायु (शिराजाल) का अभाव बताकर (निरास कर) स्थूल देह के आत्मत्व का निराकरण किया है, शुद्ध (रागादि दोषों से हीन) रहने से ही अपाप अर्थात् निष्पाप (पुण्य और पाप दोनों से रहित) कह कर उसे निर्लेप बताया है। अर्थात् सुख-दुःख और उसके अनुभव तथा उससे उत्पन्न संस्कार से हीन वह आत्मा है। और 'अकाय' (अशरीर) कह कर सूक्ष्म शरीर (लिङ्ग शरीर) की आत्मता का भी निराकरण किया गया है। तात्पर्य यह है कि स्थूल-सूक्ष्म देह, उनके कार्य, तज्जन्य संस्कार इन सबसे अतिरिक्त (पृथक्), समान, एक, अपरिच्छिन्न आत्मा का सर्वदा चिन्तन करना चाहिये ॥ १० ॥ वासुदेवो यथाऽश्वत्थे स्वदेहे चाब्रवीत्समम् । तद्वद्वेत्ति य आत्मानं समं स ब्रह्मवित्तमः ॥११॥ वासुदेव इति—जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण ने 'अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्' तथा 'वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि' कह कर अश्वत्थ ( पीपल ) के वृक्ष में और अपने शरीर में अपनी सत्ता को समान बताया है, उसी प्रकार जो पुरुष अपनी आत्मा को समस्त उपाधियों के वैषम्य से रहित सर्वत्र देखता है, वही ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ माना जाता है ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व निर्दिष्ट प्रकार से आत्मा को जो जानता है, वही ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ है। भगवान् ²वासुदेव श्रीकृष्ण ने निकृष्टोपाधिक अश्वत्थ वृक्ष के शरीर में और आविर्भूत विज्ञानैश्वर्यशक्तिमत् आत्माधिष्ठित उत्कृष्टोपाधिक अपने शरीर में 'अश्वत्थ सर्ववृक्षाणाम्'³ और ⁴'वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मिः' कहकर अपनी समान सत्ता का निर्देश किया है, उसी तरह जो पुरुष अपनी आत्मा को समस्त उपाधिकृत वैषम्य से रहित देखता है (जानता है), वही सर्वाधिक ब्रह्मवित् है ॥ ११ ॥ यथा ह्यन्यशरीरेषु ममाहन्ता न चेष्यते । अस्मिंश्चापि तथा देहे धीसाक्षित्वाविशेषतः ॥१२॥ यथेति—जिस प्रकार अन्य शरीरों में ममता और अहंता ( अहंकार ) अभीष्ट नहीं है, उसी प्रकार इस शरीर में भी ममता तथा अहंता नहीं होनी चाहिये। क्योंकि दोनों ही शरीरों में उसका ( आत्मा का ) बुद्धिसाक्षित्व समान रूप से है। निष्कर्ष यह है कि आत्मतत्त्व के विचार करने में अहंकार आदि का अवकाश न रहने से सर्वत्र समान रूप से आत्मदर्शन करना चाहिये ॥ १२ ॥ १. 'नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम्'—( बृ. उ. २।५।१८ ) २. 'सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्ति परमात्मनि । भूतेषु च स सर्वात्मा वासुदेवस्ततः स्मृतः ।—( वि. पु. ६।५।८० ) ३. ( भ. गी. १०।२६ ) ४. ( भ. गी. १०।२७ )

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