BharatKosha
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

Page 131 of 364

Read in context
Page 131

नान्यदन्यत्प्रकरणम् १०५ से प्रकाशित हो जाती है, जैसे अभिव्यक्त हुए अग्नि से जलता हुआ ईंधन प्रकाशित होता है। और गवाक्षों से निर्गत दीर्घ प्रभा जैसे सर्वदा प्रकाशित होती रहती है, वैसे ही श्रोत्रादि के माध्यम से निकलनेवाली यह बुद्धि सर्वदा प्रज्वलित (प्रकाशित) होती रहती है। इस प्रसंग में अग्नि-ईंधन के रूपक से निर्देश करने का प्रयोजन यह है कि व्यवहार-काल में विषयग्रहण के होम करने की भावना की जा सके, इस प्रकार की भावना करने से फल यह होगा कि विषयों के प्रति होनेवाली आसक्ति की निवृत्ति होगी। एवंच अविद्या आदि के द्वारा प्रेरित होनेवाली बुद्धि का परिणत होते रहना ही जागरित अवस्था है ।। २१ ।। दक्षिणाक्षिप्रधानेषु यदा बुद्धिविचेष्टते । विषयैर्हविषा दीप्ता* ह्यात्माग्निः स्थूलभुक्त्तदा ॥२२॥ दक्षिणाक्षीति—जिस समय विषय रूपी हवि से दीपित हुई बुद्धि, दक्षिण नेत्रादि इन्द्रियों में चेष्टा करती है, उस समय आत्मस्वरूप अग्नि स्थूल विषयों का भोग करता है अर्थात् भोक्ता होता है ।। २२ ।। हृदयस्पर्शिनी जिस समय विषयरूपी हवि से दीप्त हुई बुद्धि, दक्षिण नेत्रादि इन्द्रियों में चेष्टा (व्यापार) करती है, अर्थात् हविःस्थानापन्न विषयों से दीप्त होती है, यानी विषय को व्याप्त करके उस विषय के आकार में प्रकाशित होती है, उस समय आत्मारूप अग्नि, स्थूल विषयों का भोक्ता होता है, तब उसे 'जागता है' कहते हैं अर्थात् यही बुद्धि की अवस्था, जाग्रत् अवस्था (जागरण) शब्द से कही जाती है। पुरुष के दक्षिण अंग की श्रेष्ठता प्रसिद्ध है, इस कारण अक्षि में 'दक्षिण' विशेषण दिया गया है ।। २२ ।। हूयन्ते तु हवींषीति रूपादिग्रहणे स्मरन् । अरागद्वेष आत्माग्नौ जाग्रद्दोषैर्न लिप्यते ॥२३॥ हूयन्तेत्विति—जो पुरुष रूपादि विषयों के ग्रहण करते समय राग-द्वेष रहित ( वीतराग ) होकर यह स्मरण रखता है कि आत्मारूप अग्नि में हवियों का होम (हवन) किया जा रहा है, तब वह पुरुष जाग्रत् अवस्था के दोषों से लिप्त नहीं होता है ।। २३ ।। हृदयस्पर्शिनी रूपक के द्वारा निरूपण करने का फल बता रहे हैं—विषयों का ग्रहण करते समय शोभन-अशोभन के अध्यास (मिथ्या ज्ञान) से होनेवाले राग-द्वेषों से शून्य रहकर जो व्यक्ति यह स्मरण रखता है कि इन विषयरूप हवियों का आत्मारूप अग्नि में हवन (होम) किया जा रहा है, उसे जाग्रत् अवस्था के दोषों का लेप नहीं हो पाता । अर्थात् वह व्यक्ति विषयोपलब्धिनिबन्धन पुण्य-अपुण्यलक्षण जाग्रत् दोषों से लिप्त (संश्लिष्ट = सम्बद्ध) नहीं होता ।। २३ ।। मानसे तु गृहे व्यक्तः† सोऽविद्याकर्मवासनाम् । पश्यंस्तैजस आत्मोक्तः स्वयंज्योतिः प्रकाशिता‡ ॥२४॥ मानसेत्विति—अब स्वप्नावस्था को बता रहे हैं। तदनन्तर मनोरूप घर में अभिव्यक्त होकर अविद्या से उत्पन्न कर्मवासना को देखने के कारण 'आत्मा' को तैजस कहते हैं। उस समय यह स्वयंज्योति आत्मा ही विषयों का प्रकाशक होता है। क्योंकि उस समय सूर्यादि बाह्य ज्योतियों का अभाव रहता है ।। २४ ।। हृदयस्पर्शिनी जागरित अवस्था को बताने के बाद अब स्वप्नावस्था को बता रहे हैं—मनोरूप गृह (मनः परिणामाेपाधि- रूप मानसगृह) में अभिव्यक्त हुआ वह आत्मा, अविद्या से उत्पन्न हुए कर्म से उद्बुद्ध हुई वासना (अविद्याजनित कर्म- वासना) को विषय के आकार में देखनेवाला आत्मा 'तैजस' शब्द से कहा जाता है। क्योंकि वह तेज में (तेजोरूप वासनामय विषय में) अभिव्यक्त होता है। उस समय भासमान कर्म, सुख-दुःख आदि सभी मनोमात्र ही होते हैं। उस

  • दीप्त आत्मा। † व्यक्ता अविद्याकर्मवासनाः । ‡ प्रकाशिताः—पाठान्तरम् । १४