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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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नान्यदन्यत्प्रकरणम् १०७ तत्रैवं सति बुद्धीज्ञं आत्मभासाऽवभासयन्। कर्ता तासां यदर्थास्ता मूढैरेवाभिधीयते ॥२७॥ तत्रेति—ये उक्त अवस्थाएँ 'आत्मा' में अध्यस्त हैं। अतः अपने सुख-दुःख का अवभास कराने वाली बुद्धियों को अपने प्रकाश (अपने चैतन्य के आभास) से प्रकाशित करनेवाला आत्मा, मूढ़ लोगों के द्वारा उनका कर्ता कहा जाता है ॥ २७ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर कोई कह सकता है कि यदि आत्मा निर्विकार ही साक्षी कहलाता है तो उसे बुद्धि आदि का कर्ता क्यों कहते हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि उपरिनिर्दिष्ट तीनों अवस्थाएँ निर्विकार आत्मा में मोह से अध्यस्त हैं। अतः अपने सुख-दुःखावभास की कारणीभूत अवस्था सहित बुद्धियों को अपने प्रकाश (आत्मभास, स्वचैतन्याभास) से प्रकाशित करनेवाला आत्मा (ज्ञ), शास्त्राचार्योपदेश से रहित मूढ़ पुरुषों के द्वारा उनका कर्ता कहा जाता है। अर्थात् जिस आत्मा के सुख-दुःख का ज्ञान कराने के लिये बुद्धियों का स्वीकार किया गया है, उन बुद्धियों को यह आत्मा अपने प्रकाश से प्रकाशित करता रहता है, जिस कारण मूर्ख लोग उसे कर्ता कहा करते हैं। अर्थात् कर्म के कारण उद्भासित बुद्धयवस्थाओं का अनुगमन करनेवाले चिदाभास और आत्मा दोनों में विवेक न हो पाने से मूर्ख लोग उस आत्मा को ही 'दर्शनकर्ता' कहते हैं ॥ २७ ॥ सर्वज्ञोऽप्यत एव स्यात्स्वेन भासाऽवभासयन् । सर्वं सर्वक्रियाहेतोः सर्वकृत्त्वं तथाऽऽत्मनः ॥२८॥ सर्वज्ञ इति—अतएव अपने प्रकाश से सबको प्रकाशित करने के कारण वह सर्वज्ञ भी कहा जाता है और उसके सन्निधिमात्र से समस्त क्रियाओं की प्रवृत्ति होने के कारण उसमें सर्वकर्तृत्व माना जाता है ॥ २८ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार अज्ञान और उसके कार्य में प्रतिबिम्बित हुए चिदात्मा का ज्ञातृत्व उपाधिनिबन्धन होता है, यह बताकर अब मायारूप उपाधि में प्रतिबिम्बवशात् उसी की सर्वज्ञता, और सर्वकर्तृता को बता रहे हैं—स्वात्माश्रयविषयक सम्पूर्ण माया (विवर्त) को आदित्य (प्रकाश) के समान अविकृत स्वचैतन्य से भासित करने के कारण उसे सर्वज्ञ कहा जाता है। सर्व विषयों के ज्ञानकर्ता के रूप में उसे सर्वज्ञ नहीं कहा जाता। उसी तरह आत्मा का सर्वकर्तृत्व भी माया- निबन्धन ही है। अर्थात् सन्निधिमात्र से भ्रामक के समान सर्व कारकों की प्रवृत्ति कराने में कारण होने से उसका सर्वकर्तृत्व माना जाता है ॥ २८ ॥ सोपाधिश्चैवमात्मोक्तो निरुपाख्योऽनुपाधिकः । निष्कलो निर्गुणः शुद्धस्तं मनो वाक्च नाप्नुतः ॥२९॥ सोपाधिरिति—इस प्रकार से सोपाधिक आत्मा का निरूपण किया गया। किन्तु निरुपाधिक आत्मा तो अकथनीय, निष्कल, निर्गुण और शुद्ध है। उसे मन और वाणी भी प्राप्त नहीं कर पाते ॥ २९ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार तीनों अवस्थाओं के साक्षी होने से विविक्त, शुद्ध, चिद्रूप आत्मा में ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, सर्व- ज्ञत्वादि व्यवहारास्पदत्व मायोपाधिवशात् है, स्वाभाविक नहीं है, इसी उक्त अर्थ का अनुवाद करके 'वह स्वाभाविक बिम्बतुल्य आत्मस्वरूप क्या है ? इसके उत्तर में कह रहे हैं कि सोपाधिक आत्मा का वर्णन तो किया गया, और निरुपाधिक (निरुपाख्य), जो विषयतया उल्लेख के योग्य नहीं होता, उसे अनुपाधिक अर्थात् सर्वव्यवहारातीत कहते हैं। अर्थात् वह गुण, अवयव से रहित होने के कारण शुद्ध (कूटस्थ) है। उसकी निरुपाख्यता यही है कि उसे मन और वाणी प्राप्त नहीं कर सकते ॥ २९ ॥