उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर
Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)
Page 139 of 364
Read in contextनान्यदन्यत्प्रकरणम् ११३ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि परप्रकाश्य न होने पर भी (प्रकाशान्तर से दृश्य न रहने पर भी) आत्मा स्वप्रकाश्य (अपने प्रकाश का विषय-स्वरूपप्रकाशदृश्य) ही क्यों न होगा ? जैसे सूर्य, घट-पट आदि वस्तुओं को प्रकाशित करता हुआ अपने को भी प्रकाशित करता ही है, उसी प्रकार आत्मा भी दृश्य को प्रकाशित (अवभासित) करता हुआ स्वयं अपने को भी प्रकाशित करेगा। किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि जो वस्तु प्रकाशशून्य होती है, उसी की, प्रकाशस्वरूप वस्तु की सन्निधि में रहने पर अभिव्यक्ति हुआ करती है। अतः प्रकाश को सूर्य का कार्य कहना मिथ्या है ॥ ४३ ॥ यतोऽभूत्वा भवेद्यच्च तस्य तत्कार्यमिष्यते । स्वरूपत्वादभूत्वा न प्रकाशो जायते रखेः ॥४४॥ यत इति—जो वस्तु पहले नहीं है, किन्तु उत्तर क्षण में जिससे होती है, उसे उसका कार्य कहा जाता है। सूर्य का प्रकाश तो उसका अपना स्वरूप ही है। वह पहले नहीं था, बाद में उत्पन्न हुआ हो—यह बात नहीं है ॥ ४४ ॥ हृदयस्पर्शिनी जो वस्तु पहले न होकर बाद में जिससे होती है, वह उसका कार्य कही जाती है। किन्तु सूर्य का प्रकाश तो उसका अपना स्वरूप है। 'वह पहले नहीं था, बाद में उत्पन्न हुआ' यह नहीं कह सकते ॥ ४४ ॥ सत्तामात्रे प्रकाशस्य कर्त्ताऽऽदित्यादिरिष्यते । घटादिव्यक्तितो यद्वत्तद्वद्बोधात्मनोष्यताम् ॥४५॥ सत्तेति—जिस प्रकार प्रकाश के रहने से घट-पटादि पदार्थों की अभिव्यक्ति होती है। अतः सूर्य आदि को प्रकाश का कर्त्ता माना जाता है। उसी प्रकार भिन्न-भिन्न पदार्थों का ज्ञान होने के कारण आत्मा को बोध का कर्ता कह दिया करते हैं। किन्तु वास्तव में उसमें (आत्मा में) किसी प्रकार का कोई कर्तृत्व नहीं है ॥ ४५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि प्रकाशस्वरूप आदित्य (सूर्य) को प्रकाशक (प्रकाश करनेवाला), और बोध (ज्ञान) स्वरूप आत्मा को बोद्धा (ज्ञाता) कैसे कहा जाता है ? जिस प्रकार प्रकाश की सत्तामात्र से घट-पटादि वस्तुओं की अभिव्यक्ति होने के कारण सूर्य को प्रकाशक कहा जाता है, उसी प्रकार बोधस्वरूप आत्मा में स्वाध्यस्त वस्तु की सन्निधिमात्र रहने पर वह सबका ज्ञाता (बोधक) कहा जाता है, वास्तव में वह कर्ता नहीं है ॥ ४५ ॥ बिलात्सर्पस्य निर्याणे सूर्यो यद्वत्प्रकाशकः । प्रयत्नेन विना तद्वज्ज्ञाताऽऽत्मा बोधरूपतः ॥४६॥ बिलादिति—जिस प्रकार सर्प, बिल से बाहर जब निकलता है तब बिना किसी प्रयत्न के ही सूर्य, उसका प्रकाशक हो जाता है। उसी प्रकार बोधस्वरूप होने के कारण आत्मा भी किसी विकार को प्राप्त हुए बिना ही सभी का ज्ञाता होता है ॥ ४६ ॥ हृदयस्पर्शिनी अपने में (स्वगत) विकार हुए बिना ही आत्मा, अर्थप्रकाशक होता है, इसे सूर्य के दृष्टान्त से बताते हैं— जैसे सर्प अपने बिले से बाहर निकलता है, तब उसे प्रकाशित करने के लिए सूर्य को कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता, बिना प्रयत्न के ही वह सर्प को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार आत्मा बोधस्वरूप होने के कारण बिना प्रयत्न के ही (विकार को प्राप्त हुए बिना ही) ज्ञाता कहा जाता है ॥ ४६ ॥ १५