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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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पार्थिवप्रकरणम् १२१ चक्षुर्वदिति - जीवात्मा का कर्मत्व और कर्तृत्व भी नेत्र के समान माना जा सकता है, किन्तु यह कहना उचित नहीं होगा। क्योंकि नेत्र तो अनेकरूप और संहत है। इसलिये उसमें तो उस प्रकार का भेद हो सकता है, किन्तु जीवात्मा तो साक्षीस्वरूप होने से उसे साक्ष्यस्वरूप नहीं कह सकते ॥ १०॥ हृदयस्पर्शिनो दुःखी होने वाले अन्तःकरण का द्रष्टा रहने पर भी आत्मा का दुःखी होना संभव क्यों नहीं है ? जैसे दर्पणस्थ चक्षु, गोलकस्थ चक्षु का दृश्य (कर्म) होता है। अर्थात् दर्पणस्थ होता हुआ चक्षु दृश्य होता है और मुख- देश में स्थित होता हुआ वह द्रष्टा भी होता है, उसी तरह जब वह आत्मा, दुःखसंभिन्न (दुःखसम्पृक्त) होता है, तब वह दृश्य रहता है, और जब वही आत्मा अपने स्वरूपभूत चैतन्य में अवस्थित रहता है, तब उसे द्रष्टा समझा जाता है। एवं च एक ही में अवस्थाभेद से कर्म-कर्तृभाव घट सकता है - इस प्रकार यदि कोई कहे तो उसका समाधान यह होगा-नेत्र तो अनेकरूप (अनेकाकार) और संहत है, अतः उसमें कर्म-कर्तृभाव (अंश भेद) उपपन्न हो सकता है। अर्थात् दर्पणस्थ गोलकांश में दृश्यत्व और उसी का मुखनिविष्ट शक्तिमत्त्वांश में द्रष्टृत्व, इस रीति से एक ही चक्षु (नेत्र) में उभयरूपत्व उपपन्न हो सकता है। किन्तु इस प्रकार का अंशभेद आत्मा में नहीं पाया जाता, क्योंकि वह (आत्मा) एकरूप है, असंहत है (संघातरूप, समूहरूप नहीं है)। अतः चित्प्रकाशैकस्वभाव आत्मा द्रष्टा ही है, वह दृश्यांश से युक्त नहीं है। क्योंकि दृश्यांश तो अनामरूप होता है। अतः द्रष्टा होने से वह कभी कर्म नहीं बन सकता। एवं च आत्मा साक्षीस्वरूप होने से वह कभी भी साक्ष्य रूप नहीं हो सकता ॥ १० ॥ ज्ञानयत्नाद्यनेकत्वमात्मनोऽपि मतं यदि । नैकज्ञानगुणत्वात्तु ज्योतिर्वत्तस्य कर्मता ॥११॥ ज्ञानेति-आत्मा को इच्छादिगुणविशिष्ट और अनेक मानने वाले नैयायिकों के मतानुसार आत्मा का भी अनेकत्व (अंश-भेद से ग्राह्यत्व और ग्राहकत्व) कहना भी ठीक नहीं है। क्योंकि जीवात्मा, एकमात्र ज्ञानस्वभाव के कारण प्रकाश के समान वह अपना कर्म (दृश्य) नहीं बन सकता ॥ ११ ॥ हृदयस्पर्शिनो नैयायिक आत्मा को इच्छादिगुणविशिष्ट और अनेक मानते हैं, तदनुसार आत्मा में अनेकत्व अर्थात् अंशभेद से ग्राह्यत्व (भास्यत्व) और ग्राहकत्व (भासकत्व) क्यों न माना जाय ? निष्कर्ष यह है कि ज्ञान, प्रयत्न, इच्छा, द्वेषादि अनेक गुणों के कारण अनेकात्मकता होने से किसी अंश से विशिष्ट हुए आत्मा में ग्राह्यत्व और अन्य किसी अंश से विशिष्ट हुए उसी आत्मा में ग्राहकत्व भी हो सकता है। किन्तु इस तरह से उभयरूपता आत्मा में नहीं कह सकते, क्योंकि श्रुति ने आत्मा को ज्ञानैकस्वभाव, विज्ञानघन¹ कह कर उसे एकरूप ही बताया है, अनेकरूप नहीं। इस कारण प्रकाश के समान (ज्योतिर्वत्) वह (आत्मा) अपना कर्म (दृश्य) नहीं हो सकता । अतः आत्मा केवल ग्राहक ही है, वह कभी ग्राह्य नहीं है ॥ ११ ॥ ज्योतिषो द्योतकत्वेऽपि यद्वन्नात्मप्रकाशनम् । भेदेऽप्येवं समत्त्वाज्ज नात्मानं नैव पश्यति ॥१२॥ ज्योतिष इति--जिस प्रकार सूर्यादि ज्योतिर्मय पदार्थ प्रकाशक होने पर भी अपने को कर्मरूप में प्रकाशित नहीं करते, उसी प्रकार आत्मा में यदि अंशभेद भी मान लिया जाय तो भी चिन्मात्र रूप से उसमें समानता रहने से वह अपने को नहीं देख सकता। क्योंकि आत्मा में अंशभेद से ग्राह्य-ग्राहक भाव मानने पर ग्राह्य अंश को यदि चेतन कहें तो वह किसी का विषय नहीं हो सकता, क्योंकि चेतन तो सर्वदा प्रकाशक ही होता है, वह कभी भी प्रकाश्य नहीं होता। यदि ग्राह्य जड़ माने तो प्रकाश और अन्धकार के समान चेतन और जड़ दोनों परस्परविरुद्ध धर्म होने से एक जगह (एक आत्मा में) कभी नहीं रह सकते। दोनों का एक जगह रहना युक्तिविरुद्ध होगा ॥ १२ ॥ १. (मुं. उ. २।२।९) १६