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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages

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शून्यतेति—शून्यवादी बौद्ध सभी पदार्थों का निराकरण करते हैं और वे एकमात्र शून्य को ही परम तत्त्व मानते हैं। किन्तु उनका यह शून्यवाद भी युक्तिविरुद्ध है। क्योंकि बुद्धि तो जड है, इसलिये वह परप्रकाश्य है। घट के समान बुद्धि का भी किसी दूसरे के द्वारा देखा जाना ही उचित है, उसी प्रकार शून्य पदार्थ भी जड़ होने के कारण उसे भी परप्रकाश्य ही कहना होगा। इसलिये उस शून्य को परम तत्त्व नहीं कहा जा सकेगा। उसे देखने वाला अन्य पदार्थ, शून्य या बुद्धि की कल्पना से पूर्व विद्यमान है। इस कारण बुद्धि का शून्यत्व कहना ठीक नहीं है। अतः बुद्धि का जो साक्षी है, वही आत्मतत्त्व है और वही परम तत्त्व है। बुद्धि उसी में अध्यस्त है ॥ १५ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार बुद्धि के स्वग्राह्यत्व का निराकरण करने से अन्यग्राह्यत्व अर्थात् प्राप्त हो जाता है, अन्यथा उसकी क्षणिकता सिद्ध नहीं हो पायेगी। अतः शून्यवादी बौद्धों का कहना है कि न बुद्धि का मानना आवश्यक है और न हीं उसके किसी अन्य ग्राहक को मानने की आवश्यकता है, 'शून्य' ही आत्मतत्त्व है। किन्तु शून्यवादी का यह शून्यता का सिद्धान्त भी ठीक नहीं है। जिस प्रकार युक्तिविरोध के कारण बुद्धि की स्वग्राह्यता उचित नहीं, उसी प्रकार बुद्धि और उसमें स्थित अवभास की शून्यता को मानना भी उचित नहीं। क्योंकि अपरोक्षतया उसकी प्रतीति होती है। उस कारण घट के समान बुद्धि का भी किसी अन्य के द्वारा देखा जाना ही युक्ति युक्तहै। साक्षी में पर्यवसान होने से उसकी शून्यता की शंका करना भी उचित नहीं है। बुद्धि की कल्पना करने के पूर्व से ही सुषुप्ति में भी आत्मप्रकाश की विद्य- मानता माननी ही होगी। इस प्रकार से साक्षी की सिद्धि होने से कभी भी शून्यता है ही नहीं। सुषुप्ति में साक्षी को न माना जाय तो, सुषुप्ति के अनन्तर प्रबोध में परामर्श न होने का ही प्रसंग प्राप्त होगा। शून्यवादी सब वस्तुओं का निराकरण कर एकमात्र शून्य को ही परमार्थतत्त्व मानते हैं। जैसे बुद्धि जड़ और परप्रकाशय है, उसी प्रकार शून्य भी जड़ और परप्रकाशय है, अतः उसे परमार्थतत्त्व नहीं कह सकते। अतः जो बुद्धि का साक्षी है, वही आत्मतत्त्व परमार्थतत्त्व है। उसी में बुद्धि अध्यस्त है। वह बुद्धि से पूर्व भी विद्यमान है। अतः शून्य को परमार्थतत्त्व के रूप में नहीं माना जा सकता है ॥ १५ ॥ अविकल्पं तदस्त्येव यत्पूर्वं स्याद्विकल्पतः । विकल्पोत्पत्तिहेतुत्वाद्यद्यस्यैव तु कारणम् ॥१६॥ अविकल्पमिति—जो पदार्थ विकल्प के पहिले स्थित रहता है, वह विकल्प की उत्पत्ति में कारण होता है। अतः वह स्वयं अविकल्परूप होता है। जो जिसका कारण रहता है, वह उससे पूर्व ही हुआ करता है ॥ १६ ॥ हृदयस्पर्शिनी किञ्च जो कार्य, जिससे अन्वित हुआ दिखाई देता है, वह उसका कारण होता है और कार्य की कल्पना के पूर्व भी वह रहता है। जैसे घटरूप कार्य मृत्तिका (मिट्टी) से अन्वित होने के कारण वह मृत्तिका घट का कारण कहलाती है, और घटरूप कार्य की उत्पत्ति के पूर्व भी वह रहती है। उसी तरह बुद्धि आदि विकल्प, 'सत्' रूप अर्थ से अन्वित हुआ उपलब्ध होता है, और वह बुद्धयादि विकल्प के पूर्व भी सिद्ध है। अतः बुद्धयादि विकल्प उसी सत् का कार्य है। उस बुद्धयादि विकल्प को सत्कारणक कहना ही उचित है। जो वस्तु विकल्प से पूर्व सिद्ध रहती है, वह विकल्प की उत्पत्ति में हेतु होती है। उस कारण वह स्वयं अविकल्पित हुआ करती है। अर्थात् यह सद्धस्तु सर्व- विकल्परहित कूटस्थ है। बिना कारण के कार्य की उत्पत्ति होना अनुपपन्न है। कार्य है तो कारण का होना नान्तरीयक ही है। अन्यथा कार्यविशेषाथियों की कारणविशेषोपादान में प्रवृत्ति का नियम उपपन्न नहीं हो सकेगा। क्योंकि शून्य तो सर्वत्र सुलभ रहता है ॥ १६ ॥ अज्ञानं कल्पनामूलं संसारस्य नियामकम् । हित्वाऽऽत्मानं परं ब्रह्म *विद्यान्मुक्तं सदाऽभयम् ॥१७॥ अज्ञानमिति—सभी विकल्पों (कल्पनाओं) के बीजभूत (मूलभूत), और संसार की स्थिति के कारणभूत अज्ञान का त्याग करके मुक्त स्वरूप एवं अभय (भयशून्य) ब्रह्मरूप आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ १७ ॥

  • विन्द्या०—पाठान्तरम् ।